दिल Poetry (page 121)

वो जब रंग-ए-परेशानी को ख़ल्वत-गीर देखेंगे

सीमाब अकबराबादी

सुकूँ-पज़ीर जुनून-ए-शबाब हो न सका

सीमाब अकबराबादी

शुक्रिया हस्ती का! लेकिन तुम ने ये क्या कर दिया

सीमाब अकबराबादी

शायद जगह नसीब हो उस गुल के हार में

सीमाब अकबराबादी

रोज़-ए-फ़िराक़ हर तरफ़ इक इंतिशार था

सीमाब अकबराबादी

रस्मन ही उन को नाला-ए-दिल की ख़बर तो हो

सीमाब अकबराबादी

नसीम-ए-सुब्ह गुलशन में गुलों से खेलती होगी

सीमाब अकबराबादी

नाहक़ शिकायत-ए-ग़म-ए-दुनिया करे कोई

सीमाब अकबराबादी

मुरत्तब हो के इक महशर ग़ुबार-ए-दिल से निकलेगा

सीमाब अकबराबादी

मुझे फ़िक्र-ओ-सर-ए-वफ़ा है हनूज़

सीमाब अकबराबादी

मेरी रिफ़अत पर जो हैराँ है तो हैरानी नहीं

सीमाब अकबराबादी

महफ़िल-ए-इश्क़ में जब नाम तिरा लेते हैं

सीमाब अकबराबादी

खो कर तिरी गली में दिल-ए-बे-ख़बर को मैं

सीमाब अकबराबादी

ख़त्म इस तरह नज़ा-ए-हक़-ओ-बातिल हो जाए

सीमाब अकबराबादी

कमाल-ए-इलम ओ तहक़ीक़-ए-मुकम्मल का ये हासिल है

सीमाब अकबराबादी

जो उम्र तेरी तलब में गँवाए जाते हैं

सीमाब अकबराबादी

जो मेरे तंगना-ए-दिल में तुझ को जल्वा-गर देखा

सीमाब अकबराबादी

जल्वा-गाह-ए-दिल में मरते ही अँधेरा हो गया

सीमाब अकबराबादी

जहान-ए-रंग-ओ-बू में मुस्तक़िल तख़्लीक़-ए-मस्ती है

सीमाब अकबराबादी

जाग और देख ज़रा आलम-ए-वीराँ मेरा

सीमाब अकबराबादी

जब तक ग़म-ए-उल्फ़त का उंसुर न मिला होगा

सीमाब अकबराबादी

इश्क़ ख़ुद माइल-ए-हिजाब है आज

सीमाब अकबराबादी

इजाज़त दे कि अपनी दास्तान-ए-ग़म बयाँ कर लें

सीमाब अकबराबादी

हुस्न के दिल में जगह पाते ही दीवाना बने

सीमाब अकबराबादी

हम हैं सर-ता-बा-पा तमन्ना

सीमाब अकबराबादी

ग़म मुझे हसरत मुझे वहशत मुझे सौदा मुझे

सीमाब अकबराबादी

छुपाता हूँ मगर छुपता नहीं दर्द-ए-निहाँ फिर भी

सीमाब अकबराबादी

चमक जुगनू की बर्क़-ए-बे-अमाँ मालूम होती है

सीमाब अकबराबादी

ब-क़द्र-ए-शौक़ इक़रार-ए-वफ़ा क्या

सीमाब अकबराबादी

बड़ी दिलचस्पियों से सुब्ह-ए-शाम-ए-ज़िंदगी होगी

सीमाब अकबराबादी

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