दिल Poetry (page 128)

एक वजूदी दोस्त के नाम

सरमद सहबाई

नींद से जागी हुई आँखों को अंधा कर दिया

सरमद सहबाई

बे-दिली में भी दिल बड़ा रखना

सरमद सहबाई

ख़्वाब-ज़ादों का दुख ज़मीनी है

सरफ़राज़ ज़ाहिद

कभी होंटों पे ऐसा लम्स अपनी आँख खोले

सरफ़राज़ ज़ाहिद

जहाँ चौखट है वाँ ज़ीना था पहले

सरफ़राज़ ज़ाहिद

ख़ुदा करे कि वही बात उस के दिल में हो

सरफ़राज़ नवाज़

तिरे ख़ुलूस के क़िस्से सुना रहा हूँ मैं

सरफ़राज़ नवाज़

नज़र भी आया तो ख़ुद से छुपा लिया मैं ने

सरफ़राज़ नवाज़

मुझ को होना है तो दरवेश के जैसा हो जाऊँ

सरफ़राज़ नवाज़

दिए निगाहों के अपनी बुझाए बैठा हूँ

सरफ़राज़ नवाज़

बला से नाम वो मेरा उछाल देता है

सरफ़राज़ नवाज़

सफ़ीना मौज-ए-बला के लिए इशारा था

सरफ़राज़ दानिश

आँखों में अगर आप की सूरत नहीं होती

सरफ़राज़ अबद

दफ़्तर-ए-शादी का मुन्तज़िम

सरफ़राज़ शाहिद

क़ाबिज़ रहा है दिल पे जो सुल्तान की तरह

सरफ़राज़ शाहिद

इश्क़ में कुछ इस सबब से भी है आसानी मुझे

सरफ़राज़ शाहिद

उसी का जल्वा-ए-ज़ेबा है चाँदनी क्या है

सरीर काबिरी

तश्कील बदर की है कभी है हिलाल की

सरीर काबिरी

जिसे तू ने समझा है ज़िंदगी उसी इंक़लाब का नाम है

सरीर काबिरी

उन को देखा तो तबीअ'त में रवानी आई

सरदार सोज़

तसव्वुरात की दुनिया सजाए बैठे हैं

सरदार सोज़

मैं फ़र्त-ए-मसर्रत से डर है कि न मर जाऊँ

सरदार सोज़

हर इक दिल यहाँ है मोहब्बत से आरी

सरदार सोज़

दर-ए-मय-कदा है खुला हुआ सर-ए-चर्ख़ आज घटा भी है

सरदार सोज़

बुझे चराग़ जलाने में देर लगती है

सरदार सोज़

ऐसा नहीं कि उन से मोहब्बत नहीं मुझे

सरदार सोज़

अफ़्सोस क्या जो हम भी तुम्हारे नहीं रहे

सरदार सोज़

कभी सुर्ख़ी से लिखता हूँ कभी काजल से लिखता हूँ

सरदार सलीम

बना देगी ज़मीं को आज शायद आसमाँ बारिश

सरदार सलीम

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