दिल Poetry (page 130)

साए की ख़ामोशी

सारा शगुफ़्ता

मौत की तलाशी मत लो

सारा शगुफ़्ता

ख़ाली आँखों का मकान

सारा शगुफ़्ता

कैसे टहलता है चाँद

सारा शगुफ़्ता

चराग़ जब मेरा कमरा नापता है

सारा शगुफ़्ता

बदन से पूरी आँख है मेरी

सारा शगुफ़्ता

किस नज़र से आप ने देखा दिल-ए-मजरूह को

साक़िब लखनवी

हिज्र की शब नाला-ए-दिल वो सदा देने लगे

साक़िब लखनवी

चल ऐ हम-दम ज़रा साज़-ए-तरब की छेड़ भी सुन लें

साक़िब लखनवी

अपने दिल-ए-बेताब से मैं ख़ुद हूँ परेशाँ

साक़िब लखनवी

यूँ अकेला दश्त-ए-ग़ुर्बत में दिल-ए-नाकाम था

साक़िब लखनवी

ये आह-ओ-फ़ुग़ाँ क्यूँ है दिल-ए-ज़ार के आगे

साक़िब लखनवी

वस्ल की उम्मीद बढ़ते बढ़ते थक कर रह गई

साक़िब लखनवी

न आसमान है साकित न दिल ठहरता है

साक़िब लखनवी

मिलता जो कोई टुकड़ा इस चर्ख़-ए-ज़बरजद में

साक़िब लखनवी

मैं नहीं कहता कि दुनिया को बदल कर राह चल

साक़िब लखनवी

कौन इन लाखों अदाओं में मुझे प्यारी नहीं

साक़िब लखनवी

कहाँ तक जफ़ा हुस्न वालों की सहते

साक़िब लखनवी

इबरत-ए-दहर हो गया जब से छुपा मज़ार में

साक़िब लखनवी

हिज्र की शब नाला-ए-दिल वो सदा देने लगे

साक़िब लखनवी

हज़ार फूल लिए मौसम-ए-बहार आए

साक़िब लखनवी

बस ऐ फ़लक नशात-ए-दिल का इंतिक़ाम हो चुका

साक़िब लखनवी

असीर-ए-इश्क़-ए-मरज़ हैं तो क्या दवा करते

साक़िब लखनवी

न कर तो ऐ दिल मजबूर आह-ए-ज़ेर-ए-लबी

साक़िब कानपुरी

मैं मसरूर हूँ उस से महजूर हो कर

साक़िब कानपुरी

हर नफ़स इक मुस्तक़िल फ़रियाद है

साक़िब कानपुरी

मुद्दत हुई इक शख़्स ने दिल तोड़ दिया था

साक़ी फ़ारुक़ी

मैं उन से भी मिला करता हूँ जिन से दिल नहीं मिलता

साक़ी फ़ारुक़ी

आग हो दिल में तो आँखों में धनक पैदा हो

साक़ी फ़ारुक़ी

सुर्ख़ गुलाब और बदर-ए-मुनीर

साक़ी फ़ारुक़ी

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