दिल Poetry (page 127)

क़ुर्बतें न बन पाए फ़ासले सिमट कर भी

सरवर अरमान

इन आँखों में कई सपने कई अरमान थे लेकिन

सरवर अरमान

देख ये जज़्ब-ए-मोहब्बत का करिश्मा तो नहीं

सरवर आलम राज़

बयान क़िस्सा-ए-बेचारगी किया जाए

सरवर आलम राज़

वक़्त के हाथों हिकायात-ए-अना भूल गए

सरवर आलम राज़

वाक़िफ़ थे कहाँ हम दिल-ए-ना-चार से पहले

सरवर आलम राज़

सुब्ह को चैन न हो शाम को आराम न हो

सरवर आलम राज़

क्या तमाशा देखिए तहसील-ए-ला-हासिल में है

सरवर आलम राज़

जिस क़दर शिकवे थे सब हर्फ़-ए-दुआ होने लगे

सरवर आलम राज़

बयान क़िस्सा-ए-बेचारगी किया जाए

सरवर आलम राज़

तेरी आशुफ़्ता-मिज़ाजी ऐ दिल

सरवत हुसैन

पाँव साकित हो गए 'सरवत' किसी को देख कर

सरवत हुसैन

मिरे सीने में दिल है या कोई शहज़ादा-ए-ख़ुद-सर

सरवत हुसैन

''एक नज़्म कहीं से भी शुरूअ हो सकती है''

सरवत हुसैन

दस से ऊपर

सरवत हुसैन

सफ़ीना रखता हूँ दरकार इक समुंदर है

सरवत हुसैन

रात बाग़ीचे पे थी और रौशनी पत्थर में थी

सरवत हुसैन

क़िन्दील-ए-मह-ओ-मेहर का अफ़्लाक पे होना

सरवत हुसैन

पत्थरों में आइना मौजूद है

सरवत हुसैन

कभी तेग़-ए-तेज़ सुपुर्द की कभी तोहफ़ा-ए-गुल-ए-तर दिया

सरवत हुसैन

हवा ओ अब्र को आसूदा-ए-मफ़्हूम कर देखूँ

सरवत हुसैन

गर्दिश-ए-सय्यारगाँ ख़ूब है अपनी जगह

सरवत हुसैन

इक रोज़ मैं भी बाग़-ए-अदन को निकल गया

सरवत हुसैन

दश्त ले जाए कि घर ले जाए

सरवत हुसैन

भर जाएँगे जब ज़ख़्म तो आऊँगा दोबारा

सरवत हुसैन

आए हैं रंग बहाली पर

सरवत हुसैन

तेरी नाराज़गी फ़स्ल-ए-ख़िज़ाँ है

सरताज आलम आबिदी

पाते रहे ये फ़ैज़ तिरी बे-रुख़ी से हम

सरताज आलम आबिदी

लगा मजनूँ को ज़हर-ए-इश्क़ क्या आब-ए-बक़ा हो कर

सरताज आलम आबिदी

हमारे लिए सुब्ह के होंट पर बद-दुआ' है

सरमद सहबाई

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