दिल Poetry (page 160)

आरज़ू भी तो कर नहीं आती

रियाज़ ख़ैराबादी

आप आए तो ख़याल-ए-दिल-ए-नाशाद आया

रियाज़ ख़ैराबादी

आईना देखते ही वो दीवाना हो गया

रियाज़ ख़ैराबादी

मेरे अफ़्कार ने जिस शय से जिला पाई है

रियासत अली ताज

आप अपनी नक़ाब है प्यारे

रियासत अली ताज

सबा गुलों की हर इक पंखुड़ी सँवारती है

रिन्द साग़री

हर एक जिस्म पे बस एक ही से गहने लगे

रिन्द साग़री

नाज़-ए-बेजा उठाइए किस से

रिन्द लखनवी

आ अंदलीब मिल के करें आह-ओ-ज़ारियाँ

रिन्द लखनवी

ज़ुल्फ़ें छोड़ीं हैं कि जोड़ा उस ने छोड़ा साँप का

रिन्द लखनवी

ज़माने में वो मह-लक़ा एक है

रिन्द लखनवी

यार आया है अहवाल-ए-दिल-ए-ज़ार दिखाओ

रिन्द लखनवी

वक़ार-ए-शाह-ए-ज़विल-इक्तदार देख चुके

रिन्द लखनवी

उल्फ़त न करूँगा अब किसी की

रिन्द लखनवी

तू आप को पोशीदा ओ इख़्फ़ा न समझना

रिन्द लखनवी

सातों फ़लक किए तह-ओ-बाला निकल गया

रिन्द लखनवी

साइलाना उन के दर पर जब मिरा जाना हुआ

रिन्द लखनवी

सदमे गुज़रे ईज़ा गुज़री

रिन्द लखनवी

नहीं क़ौल से फ़ेल तेरे मुताबिक़

रिन्द लखनवी

न अंगिया न कुर्ती है जानी तुम्हारी

रिन्द लखनवी

मुझे दे के दिल जान खोना पड़ा है

रिन्द लखनवी

मुझ बला-नोश को तलछट भी है काफ़ी साक़ी

रिन्द लखनवी

लाला-रूयों से कब फ़राग़ रहा

रिन्द लखनवी

क्यूँ-कर न लाए रंग गुलिस्ताँ नए नए

रिन्द लखनवी

ख़ामोश दाब-ए-इश्क़ को बुलबुल लिए हुए

रिन्द लखनवी

जलन दिल की लिक्खें जो हम दिल-जले

रिन्द लखनवी

हैरान सी है भचक रही है

रिन्द लखनवी

हैं ये सारे जीते-जी के वास्ते

रिन्द लखनवी

इक परी का फिर मुझे शैदा किया

रिन्द लखनवी

दिल-लगी ग़ैरों से बे-जा है मिरी जाँ छोड़ दे

रिन्द लखनवी

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