दिल Poetry (page 161)

दीद-ए-गुलज़ार-ए-जहाँ क्यूँ न करें सैर तो है

रिन्द लखनवी

छुप के घर ग़ैर के जाया न करो

रिन्द लखनवी

अदू ग़ैर ने तुझ को दिलबर बनाया

रिन्द लखनवी

आफ़त शब-ए-तन्हाई की टल जाए तो अच्छा

रिन्द लखनवी

ये इज़्न-ए-आम है ऐ वाइ'ज़ो आओ वुज़ू कर लो

रिफ़अतुल क़ासमी

कहाँ पे लाई है मेरी ख़ुदी कहाँ से मुझे

रिफ़अतुल क़ासमी

सफ़र-ए-ज़िंदगी नहीं आसाँ

रिफ़अत सुलतान

रहा असीर कई साल नक़्श-ए-पा की तरह

रिफ़अत सुलतान

नादान दिल-फ़रेब मोहब्बत न खा कभी

रिफ़अत सुलतान

ना-आश्ना-ए-दर्द नहीं बेवफ़ा नहीं

रिफ़अत सुलतान

मसर्रतों का खिला है हर एक सम्त चमन

रिफ़अत सुलतान

लम्हा लम्हा शुमार करता हूँ

रिफ़अत सुलतान

जो रिवायात भूल जाते हैं

रिफ़अत सुलतान

जब नशात-ए-अलम नहीं होता

रिफ़अत सुलतान

हुए जब से मोहब्बत-आश्ना हम

रिफ़अत सुलतान

अगर क़दम तिरे मय-कश का लड़खड़ा जाए

रिफ़अत सुलतान

अब कहीं साया-ए-गेसू भी नहीं

रिफ़अत सुलतान

यूँही गर लुत्फ़ तुम लेते रहोगे ख़ूँ बहाने में

रिफ़अत सेठी

नक़ाब-ए-रुख़ उठा कर हुस्न जब जल्वा-फ़िगन होगा

रिफ़अत सेठी

मोहब्बत में वफ़ा वालों को कब ईज़ा सताती है

रिफ़अत सेठी

लोग उट्ठे हैं तिरी बज़्म से क्या क्या हो कर

रिफ़अत सेठी

शहर-ए-शोर-ओ-शर तन्हा घर के बाम-ओ-दर तन्हा

रिफ़अत सरोश

न कोई दोस्त न दुश्मन अजीब दुनिया है

रिफ़अत सरोश

हंगामे से वहशत होती है तन्हाई में जी घबराए है

रिफ़अत सरोश

दीबाचा-ए-किताब-ए-वफ़ा है तमाम उम्र

रिफ़अत सरोश

चाँद वीरान है सदियों से मिरे दिल की तरह

रिफ़अत सरोश

बुझा बुझा के जलाता है दिल का शो'ला कौन

रिफ़अत सरोश

रक़्स

रिफ़अत नाहीद

वो दिल कि था कभी सरसब्ज़ खेतियों की तरह

रियाज़ मजीद

उस ने इक दिन भी न पूछा बोल आख़िर किस लिए

रियाज़ मजीद

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