दिल Poetry (page 163)

हर दिन जिस पर फूल खिलें वो बे-मौसम की डाल नहीं मैं

रज़्ज़ाक़ अफ़सर

तुम किसी तौर किसी शक्ल नहीं कर सकते

राज़िक़ अंसारी

खुले में छोड़ रखा है मगर सलीक़े से

राज़िक़ अंसारी

मैं मुब्तला-ए-इश्क़ हूँ मुझ को पता न था

रज़िया हलीम जंग

बयाबाँ हो कि सहरा हो मुझे तेरा सहारा हो

रज़िया हलीम जंग

जगह बची ही नहीं दिल पे चोट खाने की

रज़ी रज़ीउद्दीन

शब का सफ़र

रज़ी रज़ीउद्दीन

बुढ़ापा

रज़ी रज़ीउद्दीन

शब ज़रा देर से गुज़रेगी न घबरा ऐ दिल

रज़ी रज़ीउद्दीन

क़ल्ब-ओ-जिगर के दाग़ फ़रोज़ाँ किए हुए

रज़ी रज़ीउद्दीन

अब भी उसी तरह से इसे इंतिज़ार है

रज़ी रज़ीउद्दीन

ख़ुद-निगर थे और महव-ए-दीद-ए-हुस्न-ए-यार थे

रज़ी मुजतबा

हम इतने परेशाँ थे कि हाल-ए-दिल-ए-सोज़ाँ

राज़ी अख्तर शौक़

वो जंग मैं ने महाज़-ए-अना पे हारी है

राज़ी अख्तर शौक़

कुछ लोग समझने ही को तयार नहीं थे

राज़ी अख्तर शौक़

कैसे इस शहर में रहना होगा

राज़ी अख्तर शौक़

जिस पल मैं ने घर की इमारत ख़्वाब-आसार बनाई थी

राज़ी अख्तर शौक़

जिस ने बनाया हर आईना मैं ही था

राज़ी अख्तर शौक़

हम जहाँ नग़्मा-ओ-आहंग लिए फिरते हैं

राज़ी अख्तर शौक़

दो बादल आपस में मिले थे फिर ऐसी बरसात हुई

राज़ी अख्तर शौक़

दिन का मलाल शाम की वहशत कहाँ से लाएँ

राज़ी अख्तर शौक़

ऐ सुब्ह-ए-उमीद देर क्या है

राज़ी अख्तर शौक़

आए हम शहर-ए-ग़ज़ल में तो इस आग़ाज़ के साथ

राज़ी अख्तर शौक़

मेहमान-ए-ख़ोसूसी

रज़ा नक़वी वाही

घर की रौनक़

रज़ा नक़वी वाही

इस तरह आँखों को नम दिल पर असर करते हुए

रज़ा मौरान्वी

वास्ता कोई न रख कर भी सितम ढाते हो तुम

रज़ा लखनवी

जो ख़ुद न अपने इरादे से बद-गुमाँ होता

रज़ा लखनवी

हुस्न की फ़ितरत में दिल-आज़ारियाँ

रज़ा लखनवी

ये बात तिरी चश्म-ए-फुसूँ-कार ही समझे

रज़ा जौनपुरी

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