दिल Poetry (page 176)

जब जब तुम्हें भुलाया तुम और याद आए

राजेन्द्र कृष्ण

वो दिल से कम ज़बाँ ही से ज़ियादा बात करता था

राजेश रेड्डी

मिरे दिल के किसी कोने में इक मासूम सा बच्चा

राजेश रेड्डी

कौन पढ़ता है यहाँ खोल के अब दिल की किताब

राजेश रेड्डी

यहाँ हर शख़्स हर पल हादसा होने से डरता है

राजेश रेड्डी

सुना है ये जहाँ अच्छा था पहले

राजेश रेड्डी

शौक़ की हद को अभी पार किया जाना है

राजेश रेड्डी

सफ़र में अब के अजब तजरबा निकल आया

राजेश रेड्डी

लिख लिख के आँसुओं से दीवान कर लिया है

राजेश रेड्डी

इजाज़त कम थी जीने की मगर मोहलत ज़ियादा थी

राजेश रेड्डी

हर एक साँस ही हम पर हराम हो गई है

राजेश रेड्डी

घर से निकले थे हौसला कर के

राजेश रेड्डी

ग़म को दिल का क़रार कर लिया जाए

राजेश रेड्डी

ऐसे न बिछड़ आँखों से अश्कों की तरह तू

राजेश रेड्डी

बैठे रहो कुछ देर अभी और मुक़ाबिल

राजेन्द्र नाथ रहबर

तुम्हारी याद

राजेन्द्र नाथ रहबर

नई दुनिया

राजेन्द्र नाथ रहबर

आ जाना

राजेन्द्र नाथ रहबर

शाम कठिन है रात कड़ी है

राजेन्द्र नाथ रहबर

महताब नहीं निकला सितारे नहीं निकले

राजेन्द्र नाथ रहबर

क्या क्या सवाल मेरी नज़र पूछती रही

राजेन्द्र नाथ रहबर

बे-वफ़ाओं को वफ़ाओं का ख़ुदा हम ने कहा

राजेन्द्र नाथ रहबर

वो सवालात मुझ पर उछाले गए

राजेन्द्र कलकल

वो जितना मुझे आज़माता रहेगा

राजेन्द्र कलकल

यूँ जो ढूँडो तो यहाँ शहर में अन्क़ा निकले

रजब अली बेग सुरूर

तर्क जिस दिन से किया हम ने शकेबाई का

रजब अली बेग सुरूर

क़ुरआँ किताब है रुख़-ए-जानाँ के सामने

रजब अली बेग सुरूर

नासेहा फ़ाएदा क्या है तुझे बहकाने से

रजब अली बेग सुरूर

मरीज़-ए-हिज्र को सेहत से अब तो काम नहीं

रजब अली बेग सुरूर

लाज़िम है सोज़-ए-इश्क़ का शोला अयाँ न हो

रजब अली बेग सुरूर

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