दिल Poetry (page 178)

उर्दू का जनाज़ा है ज़रा धूम से निकले

रईस अमरोहवी

ये शहर शहर-ए-बला भी है कीना-साज़ के साथ

रईस अमरोहवी

तुम ऐ रईस! अब न अगर और मगर करो

रईस अमरोहवी

सुब्ह-ए-नौ हम तो तिरे साथ नुमायाँ होंगे

रईस अमरोहवी

सियाह है दिल-ए-गीती सियाह-तर हो जाए

रईस अमरोहवी

सियाह है दिल-ए-गीती सियाह-तर हो जाए

रईस अमरोहवी

शिकवा करने से कोई शख़्स ख़फ़ा होता है

रईस अमरोहवी

शमीम-ए-गेसू-ए-मुश्कीन-ए-यार लाई है

रईस अमरोहवी

सफ़र में कोई रुकावट नहीं गदा के लिए

रईस अमरोहवी

रक़्साँ है मुंडेर पर कबूतर

रईस अमरोहवी

रक़्साँ है मुंडेर पर कबूतर

रईस अमरोहवी

राज़-ए-गिरफ़्तगी न असीर-ए-लहन से पूछ

रईस अमरोहवी

ख़ामोश ज़िंदगी जो बसर कर रहे हैं हम

रईस अमरोहवी

कहीं से साज़-ए-शिकस्ता की फिर सदा आई

रईस अमरोहवी

हम ने ऐ दोस्त रिफ़ाक़त से भला क्या पाया

रईस अमरोहवी

हिज्र से वस्ल इस क़दर भारी

रईस अमरोहवी

हब्स के आलम में महबस की फ़ज़ा भी कम नहीं

रईस अमरोहवी

गर्द में अट रहे हैं एहसासात

रईस अमरोहवी

ढल गई हस्ती-ए-दिल यूँ तिरी रानाई में

रईस अमरोहवी

ऐ दिल शरीक-ए-ताइफ़ा-ए-वज्द-ओ-हाल हो

रईस अमरोहवी

अहरमन है न ख़ुदा है मिरा दिल

रईस अमरोहवी

अब दिल की ये शक्ल हो गई है

रईस अमरोहवी

वस्ल के मरहले से हिज्र की मंज़िल की तरफ़

राहुल झा

रंग लाती भी तो किस तौर जबीं-साई मिरी

राहुल झा

अब के बिखरा तो मैं यकजा नहीं हो पाऊँगा

राहुल झा

परेशाँ करने वालों को परेशाँ कौन देखेगा

रहमत इलाही बर्क़ आज़मी

जिस दर पे तिरा नक़्श-ए-कफ़-ए-पा न रहेगा

रहमत इलाही बर्क़ आज़मी

बहुत रौशन हम अपना नय्यर-ए-तक़दीर देखेंगे

रहमत इलाही बर्क़ आज़मी

'मीर' की सादगी बयान में रख

रहमत अमरोहवी

मोहब्बत ये बता क्या सिलसिला है

रहमान ख़ावर

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