दिल Poetry (page 180)

दिल के पर्दे पे चेहरे उभरते रहे मुस्कुराते रहे और हम सो गए

इरफ़ान सत्तार

चुप है आग़ाज़ में, फिर शोर-ए-अजल पड़ता है

इरफ़ान सत्तार

ब-ज़ोम-ए-अक़्ल ये कैसा गुनाह मैं ने किया

इरफ़ान सत्तार

अपनी ख़बर, न उस का पता है, ये इश्क़ है

इरफ़ान सत्तार

अब आ भी जाओ, बहुत दिन हुए मिले हुए भी

इरफ़ान सत्तार

वो कैसे लोग होते हैं जिन्हें हम दोस्त कहते हैं

इरफ़ान अहमद मीर

रस्म-ए-उल्फ़त से है मक़्सूद-ए-वफ़ा हो कि न हो

इरफ़ान अहमद मीर

न मैं हाल-ए-दिल से ग़ाफ़िल न हूँ अश्क-बार अब तक

इरफ़ान अहमद मीर

न मैं हाल-ए-दिल से ग़ाफ़िल न हूँ अश्क-बार अब तक

इरफ़ान अहमद मीर

ग़म-ए-हयात ने बख़्शे हैं सारे सन्नाटे

इरफ़ान अहमद

थोड़ी सी दूर तेरी सदा ले गई हमें

इरफ़ान अहमद

सख़्त वीराँ है जहाँ तेरे बाद

इरफ़ान अहमद

नक़ाब चेहरे से उस के कभी सरकता था

इरफ़ान अहमद

है दर्द के इंतिसाब सा कुछ

इरफ़ान अहमद

एक ज़हरीली रिफ़ाक़त के सिवा है और क्या

इरफ़ान अहमद

मिरे पाँव में पायल की वही झंकार ज़िंदा है

इरम ज़ेहरा

हम उस के सामने हुस्न-ओ-जमाल क्या रखते

इरम ज़ेहरा

दर्द का जब तक मज़ा हासिल न था

इरम लखनवी

अपने ग़रीब दिल की बात करते हैं राएगाँ कहाँ

इरम लखनवी

मैं सुनता रहता हूँ नग़्मे कमाल के अंदर

इक़तिदार जावेद

हज़ार बार वो बैठा हज़ार बार उठा

इक़तिदार जावेद

मैं कि वक़्फ़-ए-ग़म-ए-दौराँ न हुआ था सो हुआ

इक़बाल उमर

एक इक लम्हा कि एक एक सदी हो जैसे

इक़बाल उमर

दोस्तों में वाक़ई ये बहस भी अक्सर हुई

इक़बाल उमर

अब इलाज-ए-दिल-ए-बीमार-ए-सहर हो कि न हो

इक़बाल उमर

ख़ाकिस्तर-ए-दिल में तो न था एक शरर भी

इक़बाल सुहैल

ज़बानों पर नहीं अब तूर का फ़साना बरसों से

इक़बाल सुहैल

ये इत्र बे-ज़ियाँ नहीं नसीम-ए-नौ-बहार की

इक़बाल सुहैल

उफ़ क्या मज़ा मिला सितम-ए-रोज़गार में

इक़बाल सुहैल

पैग़ाम-ए-रिहाई दिया हर चंद क़ज़ा ने

इक़बाल सुहैल

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