दिल Poetry (page 182)

उस को नग़्मों में समेटूँ तो बुका जाने है

इक़बाल मतीन

कितने ही लोग दिल तलक आ कर गुज़र गए

इक़बाल मतीन

जब वो लब-ए-नाज़ुक से कुछ इरशाद करेंगे

इक़बाल मतीन

शहपारा-ए-अदब हो अगर वारदात-ए-दिल

इक़बाल माहिर

अज्नबिय्यत का हर इक रुख़ पे निशाँ है यारो

इक़बाल माहिर

सरहद-ए-जाँ तलक क़लम-रौ दिल

इक़बाल ख़ुसरो क़ादरी

ख़्वाब बर्फ़ानी चिता है

इक़बाल ख़ुसरो क़ादरी

चश्म-ए-ख़ाना मक़ाम-ए-दर्द का है

इक़बाल ख़ुसरो क़ादरी

आँखों के चराग़ वारते हैं

इक़बाल ख़ुसरो क़ादरी

ज़ियान-ए-दिल ही इस बाज़ार में सूद-ए-मोहब्बत है

इक़बाल कौसर

करें हिजरत तो ख़ाक-ए-शहर भी जुज़-दान में रख लें

इक़बाल कौसर

काहिश-ए-ग़म ने जिगर ख़ून किया अंदर से

इक़बाल कौसर

कभी आइने सा भी सोचना मुझे आ गया

इक़बाल कौसर

जिस तरह लोग ख़सारे में बहुत सोचते हैं

इक़बाल कौसर

अगरचे मुझ को बे-तौक़-ओ-रसन-बस्ता नहीं छोड़ा

इक़बाल कौसर

यही नहीं कि निगाहों को अश्क-बार किया

इक़बाल कैफ़ी

साइल के लबों पर है दुआ और तरह की

इक़बाल कैफ़ी

वो आ रहे हैं वो जा रहे हैं मिरे तसव्वुर पे छा रहे हैं

इक़बाल हुसैन रिज़वी इक़बाल

पाता हूँ इज़्तिराब रुख़-ए-पुर-हिजाब में

इक़बाल हुसैन रिज़वी इक़बाल

निगाहों से मेरी निगाहें बचाए

इक़बाल हुसैन रिज़वी इक़बाल

मिरी नज़र से जो नज़रें बचाए बैठे हैं

इक़बाल हुसैन रिज़वी इक़बाल

इश्क़ इतना कमाल रखता है

इक़बाल हुसैन रिज़वी इक़बाल

दिल-ए-मुज़्तर को हम कुछ इस तरह समझाए जाते हैं

इक़बाल हुसैन रिज़वी इक़बाल

आँखों को इंतिशार है दिल बे-क़रार है

इक़बाल हुसैन रिज़वी इक़बाल

वही कैफ़िय्यत-ए-चश्म-ओ-दिल-ओ-जाँ है 'इक़बाल'

इक़बाल हैदर

खोए गए तो आइने को मो'तबर किया

इक़बाल हैदर

जो तेरे दर्द हैं वही सब मेरे दर्द हैं

इक़बाल हैदर

बुझ गई दिल की किरन आईना-ए-जाँ टूटा

इक़बाल हैदर

ये निगाह-ए-शर्म झुकी झुकी ये जबीन-ए-नाज़ धुआँ धुआँ

इक़बाल अज़ीम

मुझे अपने ज़ब्त पे नाज़ था सर-ए-बज़्म रात ये क्या हुआ

इक़बाल अज़ीम

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