दिल Poetry (page 183)

आँखों से नूर दिल से ख़ुशी छीन ली गई

इक़बाल अज़ीम

जो हो सके तो कभी इतनी मेहरबानी कर

इक़बाल अासिफ़

ख़्वाहिश हमारे ख़ून की लबरेज़ अब भी है

इक़बाल अशहर कुरेशी

फिर तिरा ज़िक्र किया बाद-ए-सबा ने मुझ से

इक़बाल अशहर

तुम्हारी ख़ुश्बू थी हम-सफ़र तो हमारा लहजा ही दूसरा था

इक़बाल अशहर

कितने भूले हुए नग़्मात सुनाने आए

इक़बाल अशहर

ख़ुदा ने लाज रखी मेरी बे-नवाई की

इक़बाल अशहर

दयार-ए-दिल में नया नया सा चराग़ कोई जला रहा है

इक़बाल अशहर

मुझ पर निगाह-ए-गर्दिश-ए-दौराँ नहीं रही

इक़बाल आबिदी

मिले वो दर्स मुझ को ज़िंदगी से

इक़बाल आबिदी

अब वो पहला सा इल्तिफ़ात कहाँ

इक़बाल आबिदी

न पूछो दोस्तो मैं किस तरह हँसता हँसाता हूँ

इन्तिज़ार ग़ाज़ीपुरी

कौन सा ग़म है मिरे दिल में जो मेहमान नहीं

इन्तेसार हुसैन आबिदी शाहिद

उस संग-दिल के हिज्र में चश्मों को अपने आह

इंशा अल्लाह ख़ान

दहकी है आग दिल में पड़े इश्तियाक़ की

इंशा अल्लाह ख़ान

ज़ोफ़ आता है दिल को थाम तो लो

इंशा अल्लाह ख़ान

ज़िन्हार हिम्मत अपने से हरगिज़ न हारिए

इंशा अल्लाह ख़ान

ये जो मुझ से और जुनूँ से याँ बड़ी जंग होती है देर से

इंशा अल्लाह ख़ान

यास-ओ-उमीद-ओ-शादी-ओ-ग़म ने धूम उठाई सीने में

इंशा अल्लाह ख़ान

याँ ज़ख़्मी-ए-निगाह के जीने पे हर्फ़ है

इंशा अल्लाह ख़ान

वो जो शख़्स अपने ही ताड़ में सो छुपा है दिल ही की आड़ में

इंशा अल्लाह ख़ान

वो देखा ख़्वाब क़ासिर जिस से है अपनी ज़बाँ और हम

इंशा अल्लाह ख़ान

तुम्हारे हाथों की उँगलियों की ये देखो पोरें ग़ुलाम तीसों

इंशा अल्लाह ख़ान

टुक क़ैस को छेड़-छाड़ कर इश्क़

इंशा अल्लाह ख़ान

टुक आँख मिलाते ही किया काम हमारा

इंशा अल्लाह ख़ान

तुझ से यूँ यक-बार तोड़ूँ किस तरह

इंशा अल्लाह ख़ान

तू ने लगाई अब की ये क्या आग ऐ बसंत

इंशा अल्लाह ख़ान

तोडूँगा ख़ुम-ए-बादा-ए-अंगूर की गर्दन

इंशा अल्लाह ख़ान

तफ़ज़्जुलात नहीं लुत्फ़ की निगाह नहीं

इंशा अल्लाह ख़ान

शब ख़्वाब में देखा था मजनूँ को कहीं अपने

इंशा अल्लाह ख़ान

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