दिल Poetry (page 181)

न रहा ज़ौक़-ए-रंग-ओ-बू मुझ को

इक़बाल सुहैल

असीरों में भी हो जाएँ जो कुछ आशुफ़्ता-सर पैदा

इक़बाल सुहैल

अब दिल को हम ने बंदा-ए-जानाँ बना दिया

इक़बाल सुहैल

'साजिद' तू फिर से ख़ाना-ए-दिल में तलाश कर

इक़बाल साजिद

वो मुसलसल चुप है तेरे सामने तन्हाई में

इक़बाल साजिद

सूरज हूँ चमकने का भी हक़ चाहिए मुझ को

इक़बाल साजिद

सरसब्ज़ दिल की कोई भी ख़्वाहिश नहीं हुई

इक़बाल साजिद

संग-दिल हूँ इस क़दर आँखें भिगो सकता नहीं

इक़बाल साजिद

रुख़-ए-रौशन का रौशन एक पहलू भी नहीं निकला

इक़बाल साजिद

पता कैसे चले दुनिया को क़स्र-ए-दिल के जलने का

इक़बाल साजिद

मिला तो हादिसा कुछ ऐसा दिल ख़राश हुआ

इक़बाल साजिद

ख़ुदा ने जिस को चाहा उस ने बच्चे की तरह ज़िद की

इक़बाल साजिद

ख़ौफ़ दिल में न तिरे दर के गदा ने रक्खा

इक़बाल साजिद

कटते ही संग-ए-लफ़्ज़ गिरानी निकल पड़े

इक़बाल साजिद

कल शब दिल-ए-आवारा को सीने से निकाला

इक़बाल साजिद

हर कसी को कब भला यूँ मुस्तरद करता हूँ मैं

इक़बाल साजिद

ग़ार से संग हटाया तो वो ख़ाली निकला

इक़बाल साजिद

ग़ार से संग हटाया तो वो ख़ाली निकला

इक़बाल साजिद

इक तबीअत थी सो वो भी ला-उबाली हो गई

इक़बाल साजिद

अपनी अना की आज भी तस्कीन हम ने की

इक़बाल साजिद

ऐसे घर में रह रहा हूँ देख ले बे-शक कोई

इक़बाल साजिद

मिरे लबों का तबस्सुम तो सब ने देख लिया

इक़बाल सफ़ी पूरी

वो निगाहों को जब बदलते हैं

इक़बाल सफ़ी पूरी

हर मोड़ नई इक उलझन है क़दमों का सँभलना मुश्किल है

इक़बाल सफ़ी पूरी

गुज़र गई जो चमन पर वो कोई क्या जाने

इक़बाल सफ़ी पूरी

दामन-ए-दिल है तार तार अपना

इक़बाल सफ़ी पूरी

उस ने दिल से निकाल रक्खा है

इक़बाल पयाम

दोस्तों के हू-ब-हू पैकर का अंदाज़ा लगा

इक़बाल नवेद

सरसर चली वो गर्म कि साए भी जल गए

इक़बाल मिनहास

न कोई ग़ैर न अपना दिखाई देता है

इक़बाल मिनहास

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