दिल Poetry (page 195)

कुछ तो तअल्लुक़ कुछ तो लगाओ

इब्न-ए-सफ़ी

कुछ भी तो अपने पास नहीं जुज़-मता-ए-दिल

इब्न-ए-सफ़ी

बड़े ग़ज़ब का है यारो बड़े अज़ाब का ज़ख़्म

इब्न-ए-सफ़ी

आज की रात कटेगी क्यूँ कर साज़ न जाम न तो मेहमान

इब्न-ए-सफ़ी

क्या क्या हैं गिले उस को बता क्यूँ नहीं देता

इब्न-ए-रज़ा

दिल की बातों को दिल समझता है

इब्न-ए-मुफ़्ती

वो ख़्वाब जैसा था गोया सराब लगता था

इब्न-ए-मुफ़्ती

कर बुरा तो भला नहीं होता

इब्न-ए-मुफ़्ती

दिल वही अश्क-बार रहता है

इब्न-ए-मुफ़्ती

बर्क़ ने जब भी आँख खोली है

इब्न-ए-मुफ़्ती

वहशत-ए-दिल के ख़रीदार भी नापैद हुए

इब्न-ए-इंशा

दीदा ओ दिल ने दर्द की अपने बात भी की तो किस से की

इब्न-ए-इंशा

ये कौन आया

इब्न-ए-इंशा

लोग पूछेंगे

इब्न-ए-इंशा

लब पर नाम किसी का भी हो

इब्न-ए-इंशा

क्या धोका देने आओगी

इब्न-ए-इंशा

कुछ दे इसे रुख़्सत कर

इब्न-ए-इंशा

कातिक का चाँद

इब्न-ए-इंशा

कल हम ने सपना देखा है

इब्न-ए-इंशा

एक बार कहो तुम मेरी हो

इब्न-ए-इंशा

दिल पीत की आग में जलता है

इब्न-ए-इंशा

दिल इक कुटिया दश्त किनारे

इब्न-ए-इंशा

चाँद के तमन्नाई

इब्न-ए-इंशा

ऐ मिरे सोच-नगर की रानी

इब्न-ए-इंशा

सब को दिल के दाग़ दिखाए एक तुझी को दिखा न सके

इब्न-ए-इंशा

राज़ कहाँ तक राज़ रहेगा मंज़र-ए-आम पे आएगा

इब्न-ए-इंशा

पीत करना तो हम से निभाना सजन हम ने पहले ही दिन था कहा ना सजन

इब्न-ए-इंशा

लोग हिलाल-ए-शाम से बढ़ कर पल में माह-ए-तमाम हुए

इब्न-ए-इंशा

किस को पार उतारा तुम ने किस को पार उतारोगे

इब्न-ए-इंशा

जंगल जंगल शौक़ से घूमो दश्त की सैर मुदाम करो

इब्न-ए-इंशा

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