दिल Poetry (page 234)

मिरे मुद्दआ-ए-उल्फ़त का पयाम बन के आई

ग़ुबार भट्टी

जल्वा-ए-हुस्न अगर ज़ीनत-ए-काशाना बने

ग़ुबार भट्टी

अजब इंक़लाब का दौर है कि हर एक सम्त फ़िशार है

ग़ुबार भट्टी

बैठे हैं ईद को सब यार बग़ल में ले कर

ग़ज़नफ़र अली ग़ज़नफ़र

पत्थर

ग़ज़नफ़र

ये तमन्ना नहीं कि मर जाएँ

ग़ज़नफ़र

यक़ीन जानिए इस में कोई करामत है

ग़ज़नफ़र

सामान-ए-ऐश सारा हमें यूँ तू दे गया

ग़ज़नफ़र

ख़ला के दश्त से अब रिश्ता अपना क़त्अ करूँ

ग़ज़नफ़र

अजीब शख़्स है पहले मुझे हँसाता है

ग़ज़नफ़र

धूप का एहसास जाने क्यूँ उसे होता नहीं

ग़यास मतीन

तुझे मैं भूल जाना चाहता हूँ

ग़यास अंजुम

साज़-ए-हयात क़ैद-ओ-सलासिल कहें किसे

ग़यास अंजुम

पहुँच कर शब की सरहद पर उजाला डूब जाता है

ग़यास अंजुम

ख़ून-ए-दिल मुझ से तिरा रंग-ए-हिना माँगे है

ग़यास अंजुम

ख़सारे में रहे लेकिन न छोड़ी सादगी हम ने

ग़यास अंजुम

हम ने जब चाहा कोई आग बुझाने आए

ग़यास अंजुम

हुजूम-ए-दर्द मिला इम्तिहान ऐसा था

ग़यास अंजुम

पिया ख़मोश है मेरा

ग़ौसिया ख़ान सबीन

मुंतज़िर

ग़ौसिया ख़ान सबीन

क़दम क़दम पे है रक़्साँ उदासियों का झुण्ड

ग़ौसिया ख़ान सबीन

मुख़्तसर सी बात को भी मसअला कहते रहे

ग़ौसिया ख़ान सबीन

चल दिया नाज़ ज़माने के उठाने वाला

ग़ौसिया ख़ान सबीन

आँधी में भी चराग़ मगन है सबा के साथ

ग़ौसिया ख़ान सबीन

तुम्हारे शहर में आँगन नहीं है

ग़ौस सीवानी

दिल की नय्या दो नैनों के मोह में डूबी जाए

ग़ौस सीवानी

अब तो ख़ुद से भी कुछ ऐसा है बशर का रिश्ता

ग़ौस मोहम्मद ग़ौसी

तीर जैसे कमान से निकला

ग़नी एजाज़

कोई हमराह नहीं राह की मुश्किल के सिवा

ग़नी एजाज़

ख़्वाहिशें अपनी सराबों में न रक्खे कोई

ग़नी एजाज़

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