दिल Poetry (page 236)

जल्वे का तेरे वो आलम है कि गर कीजे ख़याल

ग़ालिब

जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा

ग़ालिब

हज़रत-ए-नासेह गर आवें दीदा ओ दिल फ़र्श-ए-राह

ग़ालिब

हाँ वो नहीं ख़ुदा-परस्त जाओ वो बेवफ़ा सही

ग़ालिब

हमारे शेर हैं अब सिर्फ़ दिल-लगी के 'असद'

ग़ालिब

हैराँ हूँ दिल को रोऊँ कि पीटूँ जिगर को मैं

ग़ालिब

गुंजाइश-ए-अदावत-ए-अग़्यार यक तरफ़

ग़ालिब

ग़म अगरचे जाँ-गुसिल है प कहाँ बचें कि दिल है

ग़ालिब

गर तुझ को है यक़ीन-ए-इजाबत दुआ न माँग

ग़ालिब

देखना तक़रीर की लज़्ज़त कि जो उस ने कहा

ग़ालिब

बू-ए-गुल नाला-ए-दिल दूद-ए-चराग़-ए-महफ़िल

ग़ालिब

बोसा देते नहीं और दिल पे है हर लहज़ा निगाह

ग़ालिब

बिसात-ए-इज्ज़ में था एक दिल यक क़तरा ख़ूँ वो भी

ग़ालिब

बे-पर्दा सू-ए-वादी-ए-मजनूँ गुज़र न कर

ग़ालिब

बे-नियाज़ी हद से गुज़री बंदा-परवर कब तलक

ग़ालिब

अर्ज़-ए-नियाज़-ए-इश्क़ के क़ाबिल नहीं रहा

ग़ालिब

आता है दाग़-ए-हसरत-ए-दिल का शुमार याद

ग़ालिब

आईना देख अपना सा मुँह ले के रह गए

ग़ालिब

आगे आती थी हाल-ए-दिल पे हँसी

ग़ालिब

ज़ुल्मत-कदे में मेरे शब-ए-ग़म का जोश है

ग़ालिब

ज़िक्र उस परी-वश का और फिर बयाँ अपना

ग़ालिब

ज़माना सख़्त कम-आज़ार है ब-जान-ए-असद

ग़ालिब

ज़ख़्म पर छिड़कें कहाँ तिफ़्लान-ए-बे-परवा नमक

ग़ालिब

ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता

ग़ालिब

यक-ज़र्रा-ए-ज़मीं नहीं बे-कार बाग़ का

ग़ालिब

वो मिरी चीन-ए-जबीं से ग़म-ए-पिन्हाँ समझा

ग़ालिब

वो फ़िराक़ और वो विसाल कहाँ

ग़ालिब

वो आ के ख़्वाब में तस्कीन-ए-इज़्तिराब तो दे

ग़ालिब

वारस्ता उस से हैं कि मोहब्बत ही क्यूँ न हो

ग़ालिब

वाँ उस को हौल-ए-दिल है तो याँ मैं हूँ शर्म-सार

ग़ालिब

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