दिल Poetry (page 235)

बेवफ़ा के वा'दे पर ए'तिबार करते हैं

ग़नी एजाज़

आप अपने को मो'तबर कर लें

ग़नी एजाज़

उस की सूरत का तसव्वुर दिल में जब लाते हैं हम

ग़मगीन देहलवी

उस के कूचे में गया मैं सो फिर आया न गया

ग़मगीन देहलवी

शम्अ-रू आशिक़ को अपने यूँ जलाना चाहिए

ग़मगीन देहलवी

न पूछ हिज्र में जो हाल अब हमारा है

ग़मगीन देहलवी

मुझ से आज़ुर्दा जो उस गुल-रू को अब पाते हैं लोग

ग़मगीन देहलवी

मिरा उस के पस-ए-दीवार घर होता तो क्या होता

ग़मगीन देहलवी

जो न वहम-ओ-गुमान में आवे

ग़मगीन देहलवी

तमाम उम्र उसे चाहना न था मुमकिन

ग़ालिब अयाज़

कभी गुमान कभी ए'तिबार बन के रहा

ग़ालिब अयाज़

हुस्न के ज़ेर-ए-बार हो कि न हो

ग़ालिब अयाज़

दर्द जब दस्तरस-ए-चारागराँ से निकला

ग़ालिब अयाज़

सदा ब-सहरा

ग़ालिब अहमद

या-रब वो न समझे हैं न समझेंगे मिरी बात

ग़ालिब

वफ़ा कैसी कहाँ का इश्क़ जब सर फोड़ना ठहरा

ग़ालिब

तंगी-ए-दिल का गिला क्या ये वो काफ़िर-दिल है

ग़ालिब

सौ बार बंद-ए-इश्क़ से आज़ाद हम हुए

ग़ालिब

साए की तरह साथ फिरें सर्व ओ सनोबर

ग़ालिब

रखियो 'ग़ालिब' मुझे इस तल्ख़-नवाई में मुआफ़

ग़ालिब

न बंधे तिश्नगी-ए-ज़ौक़ के मज़मूँ 'ग़ालिब'

ग़ालिब

मैं ना-मुराद दिल की तसल्ली को क्या करूँ

ग़ालिब

लेता नहीं मिरे दिल-ए-आवारा की ख़बर

ग़ालिब

लेता हूँ मकतब-ए-ग़म-ए-दिल में सबक़ हुनूज़

ग़ालिब

लरज़ता है मिरा दिल ज़हमत-ए-मेहर-ए-दरख़्शाँ पर

ग़ालिब

क्यूँ गर्दिश-ए-मुदाम से घबरा न जाए दिल

ग़ालिब

कोई मेरे दिल से पूछे तिरे तीर-ए-नीम-कश को

ग़ालिब

किसी को दे के दिल कोई नवा-संज-ए-फ़ुग़ाँ क्यूँ हो

ग़ालिब

खुलता किसी पे क्यूँ मिरे दिल का मोआमला

ग़ालिब

ख़ुदाया जज़्बा-ए-दिल की मगर तासीर उल्टी है

ग़ालिब

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