दिल Poetry (page 363)

बहार आई ज़माना हुआ ख़राबाती

अख़्तर अंसारी

अपनी उजड़ी हुई दुनिया की कहानी हूँ मैं

अख़्तर अंसारी

अपनी बहार पे हँसने वालो कितने चमन ख़ाशाक हुए

अख़्तर अंसारी

अब वो सीना है मज़ार-ए-आरज़ू

अख़्तर अंसारी

आरज़ू को रूह में ग़म बन के रहना आ गया

अख़्तर अंसारी

आफ़तों में घिर गया हूँ ज़ीस्त से बे-ज़ार हूँ

अख़्तर अंसारी

ये दिल कहता है कोई आ रहा है

अख़्तर अमान

तवील-तर है सफ़र मुख़्तसर नहीं होता

अख़्तर अमान

मोहब्बतों में बहुत रस भी है मिठास भी है

अख़्तर अमान

मुझ से मत पूछ मिरा हाल-ए-दरूँ रहने दे

अख़लाक़ बन्दवी

अभी अश्कों में ख़ूँ शामिल नहीं है

अख़लाक़ बन्दवी

ये तिरे लम्स का एहसास जवाँ-तर हो जाए

अख़लाक़ अहमद आहन

ये ग़ाज़ा है काजल है उबटन है क्या है

अख़लाक़ अहमद आहन

लगा के आग बुझाने की बात करते हो

अख़लाक़ अहमद आहन

जला के दिल को रखा सुब्ह-ओ-शाम रोज़-ओ-शब

अख़लाक़ अहमद आहन

उड़ा के फिर वही गर्द-ओ-ग़ुबार पहले सा

अखिलेश तिवारी

नदी का क्या है जिधर चाहे उस डगर जाए

अखिलेश तिवारी

गुत्थी न सुलझ पाई गो सुलझाई बहुत है

अखिलेश तिवारी

वो हज़ार हम पे जफ़ा सही कोई शिकवा फिर भी रवा नहीं

अख़गर मुशताक़ रहीमाबादी

जुनून-ए-इश्क़ का जो कुछ हुआ अंजाम क्या कहिए

अख़गर मुशताक़ रहीमाबादी

हंगामा-ए-आफ़ात इधर भी है उधर भी

अख़गर मुशताक़ रहीमाबादी

जिस के बग़ैर जी नहीं सकते थे जा चुका

अकबर मासूम

ऐसा एक मक़ाम हो जिस में दिल जैसी वीरानी हो

अकबर मासूम

ये सारी धूल मिरी है ये सब ग़ुबार मिरा

अकबर मासूम

ये जो इक शाख़ है हरी थी अभी

अकबर मासूम

ये गुल जिस ख़ाक से लाया गया है

अकबर मासूम

सुन! हिज्र और विसाल का जादू कहाँ गया

अकबर मासूम

नींद में गुनगुना रहा हूँ मैं

अकबर मासूम

ऐसा एक मक़ाम हो जिस में दिल जैसी वीरानी हो

अकबर मासूम

लुटाऊँ मस्तियाँ सरसब्ज़ रहगुज़र की तरह

अकबर काज़मी

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