दिल Poetry (page 361)

उस को भड़काऊ न दामन की हवाएँ दे कर

अख़तर मुस्लिमी

सब्र-ओ-क़रार-ए-दिल मिरे जाने कहाँ चले गए

अख़तर मुस्लिमी

मिरे दिल पे हाथ रख कर मुझे देने वाले तस्कीं

अख़तर मुस्लिमी

लज़्ज़त-ए-दर्द मिली जुर्म-ए-मोहब्बत में उसे

अख़तर मुस्लिमी

फ़रेब-ख़ुर्दा है इतना कि मेरे दिल को अभी

अख़तर मुस्लिमी

तुम अपनी ज़बाँ ख़ाली कर के ऐ नुक्ता-वरो पछताओगे

अख़तर मुस्लिमी

न समझ सकी जो दुनिया ये ज़बान-ए-बे-ज़बानी

अख़तर मुस्लिमी

माइल-ए-लुत्फ़ है आमादा-ए-बे-दाद भी है

अख़तर मुस्लिमी

कहाँ जाएँ छोड़ के हम उसे कोई और उस के सिवा भी है

अख़तर मुस्लिमी

दिल ही रह-ए-तलब में न खोना पड़ा मुझे

अख़तर मुस्लिमी

दरिया नज़र न आए न सहरा दिखाई दे

अख़तर मुस्लिमी

आँसुओं के तूफ़ाँ में बिजलियाँ दबी रखना

अख़तर मुस्लिमी

दिल के हर ज़ख़्म को पलकों पे सजाया तो गया

अख्तर लख़नवी

देखो उस ने क़दम क़दम पर साथ दिया बेगाने का

अख्तर लख़नवी

अब दर्द का सूरज कभी ढलता ही नहीं है

अख्तर लख़नवी

जो संग हो के मुलाएम है सादगी की तरह

अख़तर इमाम रिज़वी

चाँदनी के हाथ भी जब हो गए शल रात को

अख़तर इमाम रिज़वी

दिल जहाँ बात करे दिल ही जहाँ बात सुने

अख़्तर हुसैन जाफ़री

रेत सहरा नहीं

अख़्तर हुसैन जाफ़री

हिज्र इक हुस्न है इस हुस्न में रहना अच्छा

अख़्तर हुसैन जाफ़री

क्या लोग हैं कि दिल की गिरह खोलते नहीं

अख़्तर होशियारपुरी

उफ़ुक़ उफ़ुक़ नए सूरज निकलते रहते हैं

अख़्तर होशियारपुरी

न जब कोई शरीक-ए-ज़ात होगा

अख़्तर होशियारपुरी

दर्द की दौलत-ए-नायाब को रुस्वा न करो

अख़्तर होशियारपुरी

ज़ुल्म सहते रहे शुक्र करते रहे आई लब तक न ये दास्ताँ आज तक

अख़्तर अंसारी अकबराबादी

ज़बान बंद रही दिल का मुद्दआ' न कहा

अख़्तर अंसारी अकबराबादी

यारों के इख़्लास से पहले दिल का मिरे ये हाल न था

अख़्तर अंसारी अकबराबादी

शाइरो हद्द-ए-क़दामत से निकल कर देखो

अख़्तर अंसारी अकबराबादी

सहारा दे नहीं सकते शिकस्ता पाँव को

अख़्तर अंसारी अकबराबादी

नज़र से सफ़्हा-ए-आलम पे ख़ूनीं दास्ताँ लिखिए

अख़्तर अंसारी अकबराबादी

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