दिल Poetry (page 93)

सुब्ह का अफ़्साना कह कर शाम से

शकील बदायुनी

शोख़ नज़रों में जो शामिल बरहमी हो जाएगी

शकील बदायुनी

शिकवे तिरे हुज़ूर किए जा रहा हूँ मैं

शकील बदायुनी

शब की बहार सुब्ह की नुदरत न पूछिए

शकील बदायुनी

सरगुज़िश्त-ए-दिल को रूदाद-ए-जहाँ समझा था मैं

शकील बदायुनी

सर भी है पा-ए-यार भी शौक़-ए-सिवा को क्या हुआ

शकील बदायुनी

रंग-ए-सनम-कदा जो ज़रा याद आ गया

शकील बदायुनी

पैहम तलाश-ए-दोस्त मैं करता चला गया

शकील बदायुनी

पहलू में दर्द-ए-इश्क़ की दुनिया लिए हुए

शकील बदायुनी

नियाज़-ओ-नाज़ की ये शान-ए-ज़ेबाई नहीं जाती

शकील बदायुनी

नज़र-नवाज़ नज़ारों में जी नहीं लगता

शकील बदायुनी

नज़र से क़ैद-ए-तअय्युन उठाई जाती है

शकील बदायुनी

नसीब दर पे तिरे आज़माने आया हूँ

शकील बदायुनी

न सोचा था ये दिल लगाने से पहले

शकील बदायुनी

मुझ को साक़ी ने जो रुख़्सत किया मय-ख़ाने से

शकील बदायुनी

मिरी ज़िंदगी है ज़ालिम तिरे ग़म से आश्कारा

शकील बदायुनी

मेरे हम-नफ़स मेरे हम-नवा मुझे दोस्त बन के दग़ा न दे

शकील बदायुनी

लुत्फ़-ए-निगाह-ए-नाज़ की तोहमत उठाए कौन

शकील बदायुनी

लतीफ़ पर्दों से थे नुमायाँ मकीं के जल्वे मकाँ से पहले

शकील बदायुनी

कोई आरज़ू नहीं है कोई मुद्दआ' नहीं है

शकील बदायुनी

किसी को जब निगाहों के मुक़ाबिल देख लेता हूँ

शकील बदायुनी

ख़ुश हूँ कि मिरा हुस्न-ए-तलब काम तो आया

शकील बदायुनी

ख़ाना-ए-उम्मीद बे-नूर-ओ-ज़िया होने को है

शकील बदायुनी

करने दो अगर क़त्ताल-ए-जहाँ तलवार की बातें करते हैं

शकील बदायुनी

कैसे कह दूँ की मुलाक़ात नहीं होती है

शकील बदायुनी

कब तक 'शकील' दिल को दुआ कीजिएगा आप

शकील बदायुनी

जो दिल पे गुज़रती है वो समझा नहीं सकते

शकील बदायुनी

जाम गर्दिश में है दर-बंद हैं मय-ख़ानों के

शकील बदायुनी

इहानत-ए-दिल-ए-सब्र-आज़मा नहीं करते

शकील बदायुनी

हम उन की अंजुमन का समाँ बन के रह गए

शकील बदायुनी

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