दिल Poetry (page 91)
रोज़ शाम होती है रोज़ हम सँवरते हैं
शकीला बानो
ज़िंदगी यूँ तो बहुत अय्यार थी चालाक थी
शकील शम्सी
याद तुम आए तो फिर बन गईं बादल आँखें
शकील शम्सी
उस से गिले शिकायतें शिकवे भी छोड़ दो
शकील शम्सी
तेरी नज़र के सामने ये दिल नहीं रहा
शकील शम्सी
मुझ को तिरे सुलूक से कोई गिला न था
शकील शम्सी
ज़िंदगी और मौत का यूँ राब्ता रह जाएगा
शकील सरोश
शाम मिरी कमज़ोरी है
शकील जाज़िब
हर नक़्श अधूरा है
शकील जाज़िब
तेरी नज़रों में तो अबरू में कमाँ ढूँडता हूँ
शकील जाज़िब
निगाह ओ दिल के तमाम रिश्ते फ़ज़ा-ए-आलम से कट गए हैं
शकील जाज़िब
जुज़-निहालआरज़ू सीने में क्या रखता हूँ मैं
शकील जाज़िब
आसमाँ था तुम थे या मेरा सितारा कौन था
शकील जाज़िब
सब से पहले दिल के ख़ाली-पन को भरना
शकील जमाली
अगर हमारे ही दिल में ठिकाना चाहिए था
शकील जमाली
कोई भी दार से ज़िंदा नहीं उतरता है
शकील जमाली
खाने को तो ज़हर भी खाया जा सकता है
शकील जमाली
अगर हमारे ही दिल में ठिकाना चाहिए था
शकील जमाली
ये दिल हर इक नई कोशिश पे यूँ धड़कता है
शकील ग्वालिआरी
जान की बारी है अब दिल का ज़ियाँ ऐसा न था
शकील ग्वालिआरी
ग़म का सूरज कभी ढलता ही नहीं
शकील ग्वालिआरी
इक आस का दिया तो दिल में जलाते जाओ
शकील ग्वालिआरी
ज़रा नक़ाब-ए-हसीं रुख़ से तुम उलट देना
शकील बदायुनी
वो अगर बुरा न मानें तो जहान-ए-रंग-ओ-बू में
शकील बदायुनी
उन्हें अपने दिल की ख़बरें मिरे दिल से मिल रही हैं
शकील बदायुनी
शग़ुफ़्तगी-ए-दिल-ए-कारवाँ को क्या समझे
शकील बदायुनी
मैं नज़र से पी रहा था तो ये दिल ने बद-दुआ दी
शकील बदायुनी
कोई दिलकश नज़ारा हो कोई दिलचस्प मंज़र हो
शकील बदायुनी
काफ़ी है मिरे दिल की तसल्ली को यही बात
शकील बदायुनी
जब हुआ ज़िक्र ज़माने में मोहब्बत का 'शकील'
शकील बदायुनी
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