दिन Poetry (page 8)

लम्हा लम्हा फैलती जाती है रात

यूसुफ़ तक़ी

दर्द-ओ-ग़म रंज-ओ-अलम आह-ओ-फ़ुग़ाँ

योगेन्द्र बहल तिश्ना

जल्वा अफ़रोज़ है कअ'बे के उजालों की तरह

यज़दानी जालंधरी

मुझ को उतार हर्फ़ में जान-ए-ग़ज़ल बना मुझे

यासमीन हबीब

लम्स-ए-तिश्ना-लबी से गुज़री है

यासमीन हबीब

याद-ए-ख़ुदा से आया न ईमाँ किसी तरह

यासीन अली ख़ाँ मरकज़

बारिश रुकी वबाओं का बादल भी छट गया

यासीन अफ़ज़ाल

चाहती है आख़िर क्या आगही ख़ुदा-मालूम

याक़ूब उस्मानी

मुशाहिदा न कोई तजरबा न ख़्वाब कोई

याक़ूब राही

ये हम ने माना कि होगा विसाल-ए-यार नसीब

याक़ूब अली आसी

नज़रों में कहाँ उस की वो पहला सा रहा मैं

याक़ूब आमिर

क्या हुआ हम से जो दुनिया बद-गुमाँ होने लगी

याक़ूब आमिर

सरीर-ए-सल्तनत से आस्तान-ए-यार बेहतर था

इनामुल्लाह ख़ाँ यक़ीन

उस की याद और दर्द की सौग़ात मेरे साथ थी

यहया ख़ालिद

रंग बदला फिर हवा का मय-कशों के दिन फिरे

यगाना चंगेज़ी

मुसीबत का पहाड़ आख़िर किसी दिन कट ही जाएगा

यगाना चंगेज़ी

वाँ नक़ाब उट्ठी कि सुब्ह-ए-हश्र का मंज़र खुला

यगाना चंगेज़ी

मुझे दिल की ख़ता पर 'यास' शरमाना नहीं आता

यगाना चंगेज़ी

ख़ुदाओं की ख़ुदाई हो चुकी बस

यगाना चंगेज़ी

दिल लगाने की जगह आलम-ए-ईजाद नहीं

यगाना चंगेज़ी

अदब ने दिल के तक़ाज़े उठाए हैं क्या क्या

यगाना चंगेज़ी

आप से आप अयाँ शाहिद-ए-मअ'नी होगा

यगाना चंगेज़ी

आप को ग़ैर बहुत देखते हैं

वज़ीर अली सबा लखनवी

वाइ'ज़ के मैं ज़रूर डराने से डर गया

वज़ीर अली सबा लखनवी

नफ़्स नमरूद है क्या होना है

वज़ीर अली सबा लखनवी

देख कर ख़ुश-रंग उस गुल-पैरहन के हाथ पाँव

वज़ीर अली सबा लखनवी

आया जो मौसम-ए-गुल तो ये हिसाब होगा

वज़ीर अली सबा लखनवी

आप अपनी बेवफ़ाई देखिए

वज़ीर अली सबा लखनवी

वो अपनी उम्र को पहले पिरो लेता है डोरी में

वज़ीर आग़ा

थकन

वज़ीर आग़ा

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