दिन Poetry (page 99)

चीर कर सीने को रख दे गर न पाए ग़म-गुसार

अख़्तर अंसारी

बहार आई ज़माना हुआ ख़राबाती

अख़्तर अंसारी

अब वो सीना है मज़ार-ए-आरज़ू

अख़्तर अंसारी

वही है गर्दिश-ए-दौराँ वही लैल-ओ-नहार अब भी

अख़लाक़ बन्दवी

इधर चराग़ जल गए उधर चराग़ जल गए

अख़लाक़ बन्दवी

वहम ही होगा मगर रोज़ कहाँ होता है

अखिलेश तिवारी

उड़ा के फिर वही गर्द-ओ-ग़ुबार पहले सा

अखिलेश तिवारी

हंगामा-ए-आफ़ात इधर भी है उधर भी

अख़गर मुशताक़ रहीमाबादी

नए ख़ौफ़ का आज़ार

अकबर हैदराबादी

हर्फ़-ए-यक़ीं

अकबर हैदराबादी

ज़ोर-ओ-ज़र का ही सिलसिला है यहाँ

अकबर हमीदी

तिरा आँचल इशारे दे रहा है

अकबर हमीदी

तमाम आलम-ए-इम्काँ मिरे गुमान में है

अकबर हमीदी

रह-ए-गुमाँ से अजब कारवाँ गुज़रते हैं

अकबर हमीदी

नाम 'अकबर' तो मिरा माँ की दुआ ने रक्खा

अकबर हमीदी

उन्हें भी जोश-ए-उल्फ़त हो तो लुत्फ़ उट्ठे मोहब्बत का

अकबर इलाहाबादी

नई तहज़ीब

अकबर इलाहाबादी

दरबार1911

अकबर इलाहाबादी

तिरी ज़ुल्फ़ों में दिल उलझा हुआ है

अकबर इलाहाबादी

फिर गई आप की दो दिन में तबीअ'त कैसी

अकबर इलाहाबादी

ख़ुशी क्या हो जो मेरी बात वो बुत मान जाता है

अकबर इलाहाबादी

गले लगाएँ करें प्यार तुम को ईद के दिन

अकबर इलाहाबादी

फ़लसफ़ी को बहस के अंदर ख़ुदा मिलता नहीं

अकबर इलाहाबादी

ये तन घिरा हुआ छोटे से घर में रहता है

अकबर अली खान अर्शी जादह

ये शौक़ सारे यक़ीन-ओ-गुमाँ से पहले था

अकबर अली खान अर्शी जादह

बदल जाएँगे ये दिन रात 'अजमल'

अजमल सिराज

ज़मीं पर आसमाँ कब तक रहेगा

अजमल सिराज

शाम अपनी बे-मज़ा जाती है रोज़

अजमल सिराज

जो अश्क बरसा रहे हैं साहिब

अजमल सिराज

गुज़र गई है अभी साअत-ए-गुज़िश्ता भी

अजमल सिराज

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