दुनिया Poetry (page 11)

बना के वहम ओ गुमाँ की दुनिया हक़ीक़तों के सराब देखूँ

उमैर मंज़र

वो तो मिल कर भी नहीं मिलती है

त्रिपुरारि

मैं ख़ुद अपना लहू पीने लगा हूँ

त्रिपुरारि

इस तरह रस्म मोहब्बत की अदा होती है

त्रिपुरारि

ये किस से आज बरहम हो गई है

तिलोकचंद महरूम

वो आई शाम-ए-ग़म वक़्फ़-ए-बला होने का वक़्त आया

तिलोकचंद महरूम

कम न थी सहरा से कुछ भी ख़ाना-वीरानी मिरी

तिलोकचंद महरूम

इस का गिला नहीं कि दुआ बे-असर गई

तिलोकचंद महरूम

दिल है बेताब नज़र खोई हुई लगती है

तिलक राज पारस

इस पार जहान-ए-रफ़्तगाँ है

तौसीफ़ तबस्सुम

बजा कि दरपय-ए-आज़ार चश्म-ए-तर है बहुत

तौसीफ़ तबस्सुम

आइना मिलता तो शायद नज़र आते ख़ुद को

तौसीफ़ तबस्सुम

हमारी राह में बैठेगी कब तक तेरी दुनिया

तौक़ीर तक़ी

परी उड़ जाएगी और राजधानी ख़त्म होगी

तौक़ीर तक़ी

दर्द जब से दिल-नशीं है इश्क़ है

तौक़ीर तक़ी

बदन में रूह की तर्सील करने वाले लोग

तौक़ीर तक़ी

सदियों लहू से दिल की हिकायत लिखी गई

तसनीम फ़ारूक़ी

अक्स-ए-ज़ंजीर पे जाँ देने के पहलू दूँगा

तसनीम फ़ारूक़ी

राज़ का बज़्म में चर्चा कभी होने न दिया

तसनीम आबिदी

मिल जाए अमाँ दुनिया में पल भर नहीं लगता

तस्लीम अहमद तसव्वुर

आज ख़ुद को तबाह कर लेंगे

तरुणा मिश्रा

करते हुए तवाफ़ ख़यालात-ए-यार मैं

तरकश प्रदीप

जीना अब दुश्वार है बाबा

तारिक़ राशीद दरवेश

मेरे ज़ख़्मों का सबब पूछेगी दुनिया तुम से

तारिक़ क़मर

इस सलीक़े से मुझे क़त्ल किया है उस ने

तारिक़ क़मर

जौन-एलिया से आख़री मुलाक़ात

तारिक़ क़मर

उस ने इक बार भी पूछा नहीं कैसा हूँ मैं

तारिक़ क़मर

रेआया ज़ुल्म पे जब सर उठाने लगती है

तारिक़ क़मर

पाँव जब हो गए पत्थर तो सदा दी उस ने

तारिक़ क़मर

न तुम मिले थे तो दुनिया चराग़-पा भी न थी

तारिक़ क़मर

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