दुनिया Poetry (page 10)

कहीं शुनवाई नहीं हुस्न की महफ़िल के ख़िलाफ़

वहीद अख़्तर

जिस को माना था ख़ुदा ख़ाक का पैकर निकला

वहीद अख़्तर

हम ने देखा है मोहब्बत का सज़ा हो जाना

वहीद अख़्तर

हम को मंज़ूर तुम्हारा जो न पर्दा होता

वहीद अख़्तर

दफ़्तर-ए-लौह ओ क़लम या दर-ए-ग़म खुलता है

वहीद अख़्तर

शफ़्फ़ाफियाँ

वहीद अहमद

खिलौने

वहीद अहमद

हम ने अपने आप से जब बात की

विश्वनाथ दर्द

उसे तो दौलत-ए-दुनिया भी कम भी पाने को

विपुल कुमार

जल्द आएँ जिन्हें सीने से लगाना है मुझे

विपुल कुमार

एक भी क़तरा न छोड़ा कीजिए

विलास पंडित मुसाफ़िर

नम आँखों में क्या कर लेगा ग़ुस्सा देखेंगे

विजय शर्मा अर्श

बहुत दिनों में हम उन से जो हम-कलाम हुए

वारिस किरमानी

नई सहर है ये लोगो नया सवेरा है

वफ़ा मलिकपुरी

पागल लड़की

उरूज ज़ेहरा ज़ैदी

आख़िरी मुलाक़ातें

उरूज ज़ेहरा ज़ैदी

काश उस बुत को भी हम वक़्फ़-ए-तमन्ना देखें

उरूज ज़ैदी बदायूनी

इश्क़ के हाथों में परचम के सिवा कुछ भी नहीं

उरूज ज़ैदी बदायूनी

अश्क पर गुदाज़-दिल हाशिया चढ़ाता है

उरूज ज़ैदी बदायूनी

सारी दुनिया में दाना है अपने घर में कुछ भी नहीं

उनवान चिश्ती

जब ज़ुल्फ़ शरीर हो गई है

उनवान चिश्ती

रूठना चाहो तो अब हरगिज़ मनाने का नहीं

उम्मीद ख़्वाजा

ऐ दिल-ए-ख़ुद-ना-शनास ऐसा भी क्या

उम्मीद फ़ाज़ली

उट्ठे जो तेरे दर से तो दुनिया सिमट गई

उमर फ़ारूक़

मुझे मेहमाँ ही जानो रात भर का

उमर अंसारी

जिस आईने में भी झाँका नज़र उसी से मिली

उमर अंसारी

हो के उस कूचे से आई तो सितम ढा गई क्या

उमर अंसारी

यहाँ हम ने किसी से दिल लगाया ही नहीं 'मंज़र'

उमैर मंज़र

कभी इक़रार होना था कभी इंकार होना था

उमैर मंज़र

इल्म ओ फ़न के राज़-ए-सर-बस्ता को वा करता हुआ

उमैर मंज़र

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