दुनिया Poetry (page 57)

भला हो जिस काम में किसी का तो उस में वक़्फ़ा न कीजिएगा

हबीब मूसवी

बढ़ा दी इक नज़र में तू ने क्या तौक़ीर पत्थर की

हबीब मूसवी

दिल-ए-तन्हा में अब एहसास-ए-महरूमी नहीं शायद

हबीब हैदराबादी

मौज-ए-अन्फ़ास भी इक तेग़-ए-रवाँ हो जैसे

हबीब अशअर देहलवी

वो दर्द-ए-इश्क़ जिस को हासिल-ए-ईमाँ भी कहते हैं

हबीब अहमद सिद्दीक़ी

उन निगाहों को अजब तर्ज़-ए-कलाम आता है

हबीब अहमद सिद्दीक़ी

इस तरह दर्द का तुम अपने मुदावा करना

हबीब आरवी

ख़ुश-नज़र है न ख़ुश-ख़याल है ये

हबाब तिर्मिज़ी

तिश्ना-ए-तकमील है वहशत का अफ़्साना अभी

ग्यान चन्द मंसूर

अब्र-पारा हूँ कोई दम में चला जाऊँगा

ज्ञान चंद जैन

फ़िक्र की दुनिया में कोलम्बस बना फिरता हूँ मैं

ग्यान चन्द

क्या बताएँ आप से क्या हस्ती-ए-इंसान है

ग्यान चन्द

क्या बताएँ आप से क्या हस्ती-ए-इंसान है

ग्यान चन्द

सद-साला दौर-ए-चर्ख़ था साग़र का एक दौर

गुस्ताख़ रामपुरी

साग़र में शक्ल-ए-दुख़्तर-ए-रज़ कुछ बदल गई

गुस्ताख़ रामपुरी

न कोई दीन होता है न कोई ज़ात होती है

गुलशन बरेलवी

बग़ैर सम्त के चलना भी काम आ ही गया

गुलनार आफ़रीन

न पूछ ऐ मिरे ग़म-ख़्वार क्या तमन्ना थी

गुलनार आफ़रीन

दीन ओ दुनिया का जो नहीं पाबंद

ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी

यूँ तो दिल हर कदाम रखता है

ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी

जिस तरफ़ भी देखिए साया नहीं

गुहर खैराबादी

बे-ख़बर कैसे हो रहे हो तुम

गुहर खैराबादी

मुंतज़िर आँखें हैं मेरी शाम से

गोविन्द गुलशन

मिरी आह-ओ-फ़ुग़ाँ कुछ भी नहीं है

गोर बचन सिंह दयाल मग़मूम

जब मिली उन से नज़र मिटने का सामाँ हो गया

गोर बचन सिंह दयाल मग़मूम

बदन पे जिस के शराफ़त का पैरहन देखा

गोपालदास नीरज

मुझ पे तू मेहरबान है प्यारे

गोपाल मित्तल

फ़क़त इक शग़्ल बेकारी है अब बादा-कशी अपनी

गोपाल मित्तल

इक तू ही बर्बाद नहीं

गिरिजा व्यास

तेरे रुख़्सारों से दुनिया रौशन थी

ग़ुलाम मोहम्मद वामिक़

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