दुनिया Poetry (page 74)

पहला सा वो ज़ोर नहीं है मेरे दुख की सदाओं में

बशीर बद्र

मुझ से बिछड़ के ख़ुश रहते हो

बशीर बद्र

मिरी ज़बाँ पे नए ज़ाइक़ों के फल लिख दे

बशीर बद्र

ख़ुदा हम को ऐसी ख़ुदाई न दे

बशीर बद्र

ख़ानदानी रिश्तों में अक्सर रक़ाबत है बहुत

बशीर बद्र

बड़े ताजिरों की सताई हुई

बशीर बद्र

मुब्तला-ए-इ'ताब हैं हम लोग

बशीरुद्दीन राज़

मुझे कहना है

बशर नवाज़

ज़ेर-ए-ज़मीं हूँ तिश्ना-ए-दीदार-ए-यार का

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

न रहे नामा ओ पैग़ाम के लाने वाले

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

सुब्ह का भेद मिला क्या हम को

बाक़ी सिद्दीक़ी

मरहला दिल का न तस्ख़ीर हुआ

बाक़ी सिद्दीक़ी

जुनूँ की राख से मंज़िल में रंग क्या आए

बाक़ी सिद्दीक़ी

इस कार-ए-गह-ए-रंग में हम तंग नहीं क्या

बाक़ी सिद्दीक़ी

एतिबार-ए-नज़र करें कैसे

बाक़ी सिद्दीक़ी

ये रात

बाक़र मेहदी

उस ने कहा!

बाक़र मेहदी

निरवान

बाक़र मेहदी

ख़ामुशी

बाक़र मेहदी

वो रिंद क्या कि जो पीते हैं बे-ख़ुदी के लिए

बाक़र मेहदी

महफ़िलों में जा के घबराया किए

बाक़र मेहदी

लरज़ लरज़ के न टूटें तो वो सितारे क्या

बाक़र मेहदी

क्या ख़बर थी कि कभी बे-सर-ओ-सामाँ होंगे

बाक़र मेहदी

दुश्मन-ए-जाँ कोई बना ही नहीं

बाक़र मेहदी

बहुत ज़ी-फ़हम हैं दुनिया को लेकिन कम समझते हैं!

बाक़र मेहदी

अब ख़ानुमाँ-ख़राब की मंज़िल यहाँ नहीं

बाक़र मेहदी

लब-ए-जाँ-बख़्श के मीठे का तेरे जो मज़ा पाया

बाक़र आगाह वेलोरी

तू ख़ुश है अपनी दुनिया में

बक़ा बलूच

जिस्म अपने फ़ानी हैं जान अपनी फ़ानी है फ़ानी है ये दुनिया भी

बक़ा बलूच

सब्र-ओ-ज़ब्त की जानाँ दास्ताँ तो मैं भी हूँ दास्ताँ तो तुम भी हो

बक़ा बलूच

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