दुनिया Poetry (page 72)

नज़र आता है वो जैसा नहीं है

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

काँटे हों या फूल अकेले चुनना होगा

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

कब एक रंग में दुनिया का हाल ठहरा है

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

दीवार-ए-काबा 19 नवम्बर 1989

बिलाल अहमद

तिरी तलाश में निकला तो रास्ता हुआ मैं

बिलाल अहमद

ये चार दिन के तमाशे हैं आह दुनिया के

भारतेंदु हरिश्चंद्र

रहे न एक भी बेदाद-गर सितम बाक़ी

भारतेंदु हरिश्चंद्र

फिर मुझे लिखना जो वस्फ़-ए-रू-ए-जानाँ हो गया

भारतेंदु हरिश्चंद्र

फ़साद-ए-दुनिया मिटा चुके हैं हुसूल-ए-हस्ती मिटा चुके हैं

भारतेंदु हरिश्चंद्र

ये सब तो दुनिया में होता रहता है

भारत भूषण पन्त

हमारे हाल पे अब छोड़ दे हमें दुनिया

भारत भूषण पन्त

समुंदरों को भी दरिया समझ रहे हैं हम

भारत भूषण पन्त

रिश्तों के जब तार उलझने लगते हैं

भारत भूषण पन्त

लाख टकराते फिरें हम सर दर-ओ-दीवार से

भारत भूषण पन्त

किसी भी सम्त निकलूँ मेरा पीछा रोज़ होता है

भारत भूषण पन्त

कब तक गर्दिश में रहना है कुछ तो बता अय्याम मुझे

भारत भूषण पन्त

जुस्तुजू मेरी कहीं थी और मैं भटका कहीं

भारत भूषण पन्त

चाहतों के ख़्वाब की ताबीर थी बिल्कुल अलग

भारत भूषण पन्त

अंधेरा मिटता नहीं है मिटाना पड़ता है

भारत भूषण पन्त

वो सुन कर हूर की तारीफ़ पर्दे से निकल आए

बेख़ुद देहलवी

माशूक़ हमें बात का पूरा नहीं मिलता

बेख़ुद देहलवी

लड़ाएँ आँख वो तिरछी नज़र का वार रहने दें

बेख़ुद देहलवी

जो तमाशा नज़र आया उसे देखा समझा

बेख़ुद देहलवी

दे मोहब्बत तो मोहब्बत में असर पैदा कर

बेख़ुद देहलवी

बेवफ़ा कहने से क्या वो बेवफ़ा हो जाएगा

बेख़ुद देहलवी

आह करना दिल-ए-हज़ीं न कहीं

बेखुद बदायुनी

तुम याद मुझे आ जाते हो

बहज़ाद लखनवी

तुम्हारे हुस्न की तस्ख़ीर आम होती है

बहज़ाद लखनवी

तुझ पर मिरी मोहब्बत क़ुर्बान हो न जाए

बहज़ाद लखनवी

क्या ये भी मैं बतला दूँ तू कौन है मैं क्या हूँ

बहज़ाद लखनवी

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