दुनिया Poetry (page 75)

क्या पूछते हो मैं कैसा हूँ

बक़ा बलूच

क्या कहें क्या हुस्न का आलम रहा

बक़ा बलूच

किरदार ही से ज़ीनत-ए-अफ़्लाक हो गए

बनो ताहिरा सईद

लोग भूके हैं बहुत और निवाले कम हैं

बलवान सिंह आज़र

अकेली

बलराज कोमल

सम्त दुनिया के हम गए ही नहीं

बकुल देव

अब के ताबीर मसअला न रहे

बकुल देव

जो है चश्मा उसे सराब करो

बकुल देव

बात बिगड़ी हुई बनी सी रही

बकुल देव

नहीं दुनिया में आज़ादी किसी को

बहराम जी

किया है संदलीं-रंगों ने दर बंद

बहराम जी

ग़मगीं नहीं हूँ दहर में तो शाद भी नहीं

बहराम जी

रोज़ मामूरा-ए-दुनिया में ख़राबी है 'ज़फ़र'

ज़फ़र

दौलत-ए-दुनिया नहीं जाने की हरगिज़ तेरे साथ

ज़फ़र

या मुझे अफ़सर-ए-शाहाना बनाया होता

ज़फ़र

न उस का भेद यारी से न अय्यारी से हाथ आया

ज़फ़र

क्यूँकि हम दुनिया में आए कुछ सबब खुलता नहीं

ज़फ़र

इश्क़ तो मुश्किल है ऐ दिल कौन कहता सहल है

ज़फ़र

गालियाँ तनख़्वाह ठहरी है अगर बट जाएगी

ज़फ़र

आसमाँ पर काले बादल छा गए

बद्र-ए-आलम ख़लिश

किस को फ़ुर्सत कौन पढ़ेगा चेहरे जैसा सच्चा सच

बद्र वास्ती

धानी सुरमई सब्ज़ गुलाबी जैसे माँ का आँचल शाम

बद्र वास्ती

हयात ढूँढ रहा हूँ क़ज़ा की राहों में

बदनाम नज़र

इक हूक सी जब दिल में उट्ठी जज़्बात हमारे आ पहुँचे

बीएस जैन जौहर

कैसे कैसे स्वाँग रचाए हम ने दुनिया-दारी में

अज़रा नक़वी

हाथ खोल दिए जाएँ

अज़रा अब्बास

प्यारा प्यारा घर अपना

अज़मतुल्लाह ख़ाँ

घर में चाँदी के कोई सोने के दर रख जाएगा

अज़्म शाकरी

ऐ ख़्वाब-ए-पज़ीराई तू क्यूँ मिरी आँखों में

अज़्म बहज़ाद

उस आँख से वहशत की तासीर उठा लाया

अज़्म बहज़ाद

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