ओर Poetry (page 18)

काबे की है हवस कभी कू-ए-बुताँ की है

दाग़ देहलवी

भला हो पीर-ए-मुग़ाँ का इधर निगाह मिले

दाग़ देहलवी

नज़रों के गिर्द यूँ तो कोई दायरा न था

डी. राज कँवल

नींद के तआक़ुब में

चन्द्रभान ख़याल

लौट चलिए

चन्द्रभान ख़याल

सभी सम्तों को ठुकरा कर उड़ी जाए

चंद्र प्रकाश शाद

वो क्या जवाब दे अर्ज़-ए-सवाल से पहले

चंद्र प्रकाश जौहर बिजनौरी

रामायण का एक सीन

चकबस्त ब्रिज नारायण

फ़ना का होश आना ज़िंदगी का दर्द-ए-सर जाना

चकबस्त ब्रिज नारायण

तुम्हारी याद का इक दायरा बनाती हूँ

बिल्क़ीस ख़ान

इक दिखावा रह गया बस दिल से वो चाहत गई

बिलाल अहमद

ख़ुद अपने जुर्म का मुजरिम को ए'तिराफ़ न था

बेकल उत्साही

ये जो चेहरों पे लिए गर्द-ए-अलम आते हैं

बेदिल हैदरी

न सुनो मेरे नाले हैं दर्द-भरे दार-ओ-असरे आह-ए-सहरे

बेदम शाह वारसी

हम मय-कदे से मर के भी बाहर न जाएँगे

बेदम शाह वारसी

बताए देती है बे-पूछे राज़ सब दिल के

बेदम शाह वारसी

हवा-ए-वहशत दिल ले उड़ी कहाँ से कहाँ

बयान मेरठी

खुला है जल्वा-ए-पिन्हाँ से अज़-बस चाक वहशत का

बयान मेरठी

ख़ाक करती है ब-रंग-ए-चर्ख़-ए-नीली-फ़ाम रक़्स

बयान मेरठी

हज़ार कहता रहा मैं कि यार एक मिनट

बासिर सुल्तान काज़मी

वो सूरत गर्द-ए-ग़म में छुप गई हो

बशीर बद्र

मिरी नज़र में ख़ाक तेरे आइने पे गर्द है

बशीर बद्र

मिरी ग़ज़ल की तरह उस की भी हुकूमत है

बशीर बद्र

कोई फूल धूप की पत्तियों में हरे रिबन से बँधा हुआ

बशीर बद्र

अभी इस तरफ़ न निगाह कर मैं ग़ज़ल की पलकें सँवार लूँ

बशीर बद्र

क़र्या क़र्या ख़ाक उड़ाई कूचा-गर्द फ़क़ीर हुए

बशीर अहमद बशीर

चाँद सा चेहरा जो उस का आश्कारा हो गया

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

जुनूँ की राख से मंज़िल में रंग क्या आए

बाक़ी सिद्दीक़ी

कल के दिन जो गिर्द मय-ख़ाने के फिरते थे ख़राब

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

जो जहाँ के आइना हैं दिल उन्हों के सादा हैं

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

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