शोक Poetry (page 14)

गुल रहे नहिं नाम को सरकश हैं ख़ाराँ अल-अयाज़

वली उज़लत

अबस तोड़ा मिरा दिल नाज़ सिखलाने के काम आता

वली उज़लत

तुझ लब की सिफ़त लाल-ए-बदख़्शाँ सूँ कहूँगा

वली मोहम्मद वली

मैं आशिक़ी में तब सूँ अफ़्साना हो रहा हूँ

वली मोहम्मद वली

किया मुझ इश्क़ ने ज़ालिम कूँ आब आहिस्ता आहिस्ता

वली मोहम्मद वली

अगर गुलशन तरफ़ वो नौ-ख़त-ए-रंगीं-अदा निकले

वली मोहम्मद वली

हुस्न पर बोझ हुए उस के ही वा'दे अब तो

वली आलम शाहीन

यूँ तो हँसते हुए लड़कों को भी ग़म होता है

वाली आसी

सुनो ये ग़म की सियह रात जाने वाली है

वाली आसी

जिन की यादें हैं अभी दिल में निशानी की तरह

वाली आसी

भूले-बिसरे हुए ग़म याद बहुत करता है

वाली आसी

उस शख़्स के ग़म का कोई अंदाज़ा लगाए

वकील अख़्तर

यूँ तो तन्हाई में घबराए बहुत

वकील अख़्तर

प्यार के बंधन रिश्ते देखो

वाजिद सहरी

ज़ोहरा सुहैल शम्स ख़ुर बद्र बहा तू कौन है

वाजिद अली शाह अख़्तर

याद में अपने यार-ए-जानी की

वाजिद अली शाह अख़्तर

सहे ग़म पए रफ़्तगाँ कैसे कैसे

वाजिद अली शाह अख़्तर

जा बैठते हो ग़ैरों में ग़ैरत नहीं आती

वाजिद अली शाह अख़्तर

दस्तार-ए-फ़क़ीराना इक ताज से अफ़्ज़ूँ है

वाजिद अली शाह अख़्तर

मिरे अंदर कहीं पर खो गई है

वजीह सानी

साए ने साए को सदा दी

वजद चुगताई

रात क़ातिल की गली हो जैसे

वजद चुगताई

ना-मुरादी ही लिखी थी सो वो पूरी हो गई

वजद चुगताई

लगाएँ आग ही दिल में कि कुछ उजाला हो

वजद चुगताई

दुनिया अपनी मंज़िल पहुँची तुम घर में बेज़ार पड़े

वजद चुगताई

चाहतों की जो दिल को आदत है

वजद चुगताई

सीने में मिरे दाग़-ए-ग़म-ए-इश्क़-ए-नबी है

वहशत रज़ा अली कलकत्वी

ज़मीं रोई हमारे हाल पर और आसमाँ रोया

वहशत रज़ा अली कलकत्वी

ज़ब्त की कोशिश है जान-ए-ना-तवाँ मुश्किल में है

वहशत रज़ा अली कलकत्वी

सुरूर-अफ़्ज़ा हुई आख़िर शराब आहिस्ता आहिस्ता

वहशत रज़ा अली कलकत्वी

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