शोक Poetry (page 12)

आँखों में चुभ गईं तिरी यादों की किर्चियाँ

वसी शाह

शाख़ से कट कर अलग होने का हम को ग़म नहीं

वसीम मलिक

जो शख़्स मिरा दस्त-ए-हुनर काट रहा है

वसीम मलिक

ऐ भँवर तेरी तरह बेबाक हो जाएँगे हम

वसीम मलिक

वो ग़म अता किया दिल-ए-दीवाना जल गया

वसीम बरेलवी

तुझे पाने की कोशिश में कुछ इतना खो चुका हूँ मैं

वसीम बरेलवी

इसी ख़याल से पलकों पे रुक गए आँसू

वसीम बरेलवी

तेरी याद

वसीम बरेलवी

ज़िंदगी तुझ पे अब इल्ज़ाम कोई क्या रक्खे

वसीम बरेलवी

यही बज़्म-ए-ऐश होगी यही दौर-ए-जाम होगा

वसीम बरेलवी

तुम्हारी राह में मिट्टी के घर नहीं आते

वसीम बरेलवी

मिटे वो दिल जो तिरे ग़म को ले के चल न सके

वसीम बरेलवी

मेरे ग़म को जो अपना बताते रहे

वसीम बरेलवी

मेरा किया था मैं टूटा कि बिखरा रहा

वसीम बरेलवी

कुछ इतना ख़ौफ़ का मारा हुआ भी प्यार न हो

वसीम बरेलवी

कहाँ क़तरे की ग़म-ख़्वारी करे है

वसीम बरेलवी

चलो हम ही पहल कर दें कि हम से बद-गुमाँ क्यूँ हो

वसीम बरेलवी

ख़ुशी दामन-कशाँ है दिल असीर-ए-ग़म है बरसों से

वक़ार मानवी

हर ग़म सहना और ख़ुश रहना

वक़ार मानवी

बहुत से ग़म छुपे होंगे हँसी में

वक़ार मानवी

सलीक़ा बोलने का हो तो बोलो

वक़ार मानवी

ख़ुशी दामन-कशाँ है दिल असीर-ए-ग़म है बरसों से

वक़ार मानवी

जान नहीं पहचान नहीं है

वक़ार मानवी

गई है शाम अभी ज़ख़्म ज़ख़्म कर के मुझे

वक़ार मानवी

ज़िंदगी इतनी बे-मज़ा क्यूँ है

वक़ार हिल्म सय्यद नगलवी

इक-बटा-दो को करूँ क्यूँ न रक़म दो-बटा-चार

वक़ार हिल्म सय्यद नगलवी

बरसों बा'द मिला तो उस ने हम से पूछा कैसे हो

वक़ार फ़ातमी

तुम ख़फ़ा क्या हुए हयात गई

वक़ार बिजनोरी

रह-ए-कहकशाँ से गुज़र गया हमा-ईन-ओ-आँ से गुज़र गया

वक़ार बिजनोरी

इश्क़ में ख़ुद-सरी नहीं होती

वक़ार बिजनोरी

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