घर Poetry (page 39)

टूटे जो दाँत मुँह की शबाहत बिगड़ गई

शाद लखनवी

सुना हम को आते जो अंदर से बाहर

शाद लखनवी

ख़ुदा ही उस चुप की दाद देगा कि तुर्बतें रौंदे डालते हैं

शाद लखनवी

जो बीच में आइना हो प्यारे इधर हमारे उधर तुम्हारे

शाद लखनवी

इश्क़ में ज़ोर उम्र-भर मारा

शाद लखनवी

हस्ती-ओ-अदम में नफ़स-ए-चंद बशर के

शाद लखनवी

ग़ैरों में हिना वो मल रहा है

शाद लखनवी

गले लिपटे हैं वो बिजली के डर से

शाद लखनवी

दुखा दिल भी टुकड़े जिगर होते होते

शाद लखनवी

दिल की कहूँ या कहूँ जिगर की

शाद लखनवी

ख़्वाह मुफ़्लिसी से निकल गया या तवंगरी से निकल गया

शाद बिलगवी

ता-उम्र आश्ना न हुआ दिल गुनाह का

शाद अज़ीमाबादी

काबा ओ दैर में जल्वा नहीं यकसाँ उन का

शाद अज़ीमाबादी

अब इंतिहा का तिरे ज़िक्र में असर आया

शाद अज़ीमाबादी

वहाँ भी ज़हर-ज़बाँ काम कर गया होगा

शबनम शकील

तन्हा खड़े हैं हम सर-ए-बाज़ार क्या करें

शबनम शकील

सिमट न पाए कि हर-सू बिखर गए थे हम

शबनम शकील

सब तोड़ के बंधन दुनिया के मैं प्यार की जोत जगाऊँगी

शबनम शकील

मिरा जीना गवाही दे रहा है

शबनम शकील

मौसम के पास कोई ख़बर मो'तबर भी हो

शबनम शकील

हाथ न आई दुनिया भी और इश्क़ में भी गुमनाम रहे

शबनम शकील

हर रोज़ राह तकती हैं मेरे सिंघार की

शबनम शकील

हमराह मिरे कोई मुसाफ़िर न चला था

शबनम शकील

हमराह मिरे कोई मुसाफ़िर न चला था

शबनम शकील

हम-नशीनो कुछ नहीं रक्खा यहाँ पर कुछ नहीं

शबनम शकील

हैं मनाज़िर सब बहम-पर्दा नज़र बाक़ी नहीं

शबनम शकील

इक बे-नाम सी खोज है दिल को जिस के असर में रहते हैं

शबनम शकील

लम्हों का पथराव है मुझ पर सदियों की यलग़ार

शबनम रूमानी

अपनी मजबूरी को हम दीवार-ओ-दर कहने लगे

शबनम रूमानी

टूट के बादल फिर बरसा है

शबनम नक़वी

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