घर Poetry (page 40)

पी रहा है ज़िंदगी की धूप कितने प्यार से

शबनम नक़वी

तंहाई मेरा लिबास है

शबनम अशाई

जब तुम ने मुझे

शबनम अशाई

मैं हाथ बाँधे हुए लौट आई हूँ घर में

शबाना यूसुफ़

उसी के क़ुर्ब में रह कर हरी भरी हुई है

शबाना यूसुफ़

ले के बे-शक हाथ में ख़ंजर चलो

शबाब ललित

हद्द-ए-सितम न कर कि ज़माना ख़राब है

शबाब ललित

आ गया है वक़्त अब भुगतोगे ख़ामियाज़े बहुत

शबाब ललित

सहरा की बे-आब ज़मीं पर एक चमन तय्यार किया

शायर लखनवी

नींद से आँख वो मिल कर जागे

शायर लखनवी

ख़्वाब से आँख वो मल कर जागे

शायर लखनवी

हवा को और भी कुछ तेज़ कर गए हैं लोग

शायर लखनवी

मयस्सर जिन की नज़रों को तिरे गेसू के साए हैं

शाद आरफ़ी

चाहते हैं घर बुतों के दिल में हम

शाद आरफ़ी

अजीब शाम थी जब लौट कर मैं घर आया

सीमान नवेद

जो अपने घर को का'बा मानते हैं

सीमाब ज़फ़र

फ़िराक़-मौसम के आसमाँ में उजाड़ तारे जुड़े हुए हैं

सीमाब ज़फ़र

फिर आ गया ज़बाँ पे वही नाम क्या करें

सीमाब सुल्तानपुरी

मेहमाँ को घर में आए ज़माना गुज़र गया

सीमाब सुल्तानपुरी

सारे चमन को मैं तो समझता हूँ अपना घर

सीमाब अकबराबादी

सहरा से बार बार वतन कौन जाएगा

सीमाब अकबराबादी

खो कर तिरी गली में दिल-ए-बे-ख़बर को मैं

सीमाब अकबराबादी

जाग और देख ज़रा आलम-ए-वीराँ मेरा

सीमाब अकबराबादी

मैं ने कहा था मुझ को अँधेरे का ख़ौफ़ है

सीमा ग़ज़ल

परिंदा

सीमा ग़ज़ल

यूँ बातें तो बहुत सारी करोगे

सय्यदा अरशिया हक़

निकहत जो तिरी ज़ुल्फ़-ए-मोअ'म्बर से उड़ी है

सय्यद जहीरुद्दीन ज़हीर

ग़म सहे रुस्वा हुए जज़्बात की तहक़ीर की

सय्यद आशूर काज़मी

हर किसी आँख का बदला हुआ मंज़र होगा

साईल इमरान

आँख के साहिल पर आते ही अश्क हमारे डूब गए

सय्यद ज़िया अल्वी

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