घर Poetry (page 37)

निकल के घर से फिर इस तरह घर गए हम तुम

शाहीन ग़ाज़ीपुरी

चेहरों में नज़र आएँ आँखों में उतर जाएँ

शाहीन ग़ाज़ीपुरी

ग़ुंचा ग़ुंचा मौसम-ए-रंग-ए-अदा में क़ैद था

शाहीन बद्र

ऊपर जो परिंद गा रहा है

शाहीन अब्बास

मैं हुआ तेरा माजरा तू मिरा माजरा हुआ

शाहीन अब्बास

ख़ुद में उतरें तो पलट कर वापस आ सकते नहीं

शाहीन अब्बास

कैसा कैसा दर पस-ए-दीवार करना पड़ गया

शाहीन अब्बास

गुज़रे नहीं और गुज़र गए हम

शाहीन अब्बास

दर-ए-इम्काँ से गुज़र कर सर-ए-मंज़र आ कर

शाहीन अब्बास

अब ऐसे चाक पर कूज़ा-गरी होती नहीं थी

शाहीन अब्बास

उस ने मुझ से तो कुछ कहा ही नहीं

शाहबाज़ रिज़्वी

साअत-ए-आसूदगी देखे हुए अर्सा हुआ

शहबाज़ नदीम ज़ियाई

मचलते रहते हैं बिस्तर पे ख़्वाब मेरे लिए

शहबाज़ नदीम ज़ियाई

दयार-ए-शाम न बुर्ज-ए-सहर में रौशन हूँ

शहबाज़ नदीम ज़ियाई

हम क़ुव्वत-ए-जज़्ब-ए-दिल दिखाएँ

शहाबुद्दीन साक़िब

था बाम-ए-फ़लक ख़ाक-बसर आने लगा हूँ

शहाब सफ़दर

शाम रखती है बहुत दर्द से बेताब मुझे

शहाब जाफ़री

रुत्बा-ए-दर्द को जब अपना हुनर पहुँचेगा

शहाब जाफ़री

क़ैद-ए-इम्काँ से तमन्ना थी गमीं छूट गई

शहाब जाफ़री

हवस-ए-ज़ुल्फ़-ए-गिरह-गीर लिए बैठे हैं

शहाब जाफ़री

बे-सर-ओ-सामाँ कुछ अपनी तब्अ से हैं घर में हम

शहाब जाफ़री

भरा घर है कोई सहरा नहीं है

शहाब अशरफ़

मेरी शाइ'री

शहाब अख़्तर

मेरा शहर

शहाब अख़्तर

न हाथ रख मिरे सीने पे दिल नहीं इस में

शाह नसीर

दैर-ओ-काबा में तफ़ावुत ख़ल्क़ के नज़दीक है

शाह नसीर

वाँ कमर बाँधे हैं मिज़्गाँ क़त्ल पर दोनों तरफ़

शाह नसीर

तिरे दाँत सारे सफ़ेद हैं पए-ज़ेब पान से मल कर आ

शाह नसीर

टाँकों से ज़ख़्म-ए-पहलू लगता है कंखजूरा

शाह नसीर

शब जो रुख़-ए-पुर-ख़ाल से वो बुर्के को उतारे सोते हैं

शाह नसीर

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