घर Poetry (page 36)

कोई सर्द हवा लब-ए-बाम चली

शाहिदा हसन

जब घर ही जुदा जुदा रहेगा

शाहिदा हसन

एहसास तो मुझी पे कर रही है

शाहिदा हसन

चराग़-ए-शाम ही तन्हा नहीं है

शाहिदा हसन

ज़ंजीर कट के क्या गिरी आधे सफ़र के बीच

शाहिद ज़की

सीने की मिसाल आग है चाँदी सा धुआँ है

शाहिद शैदाई

आँखों में है पर आँख ने देखा नहीं अभी

शाहिद शैदाई

समुंदरों में अगर ख़लफ़िशार-ए-आब न हो

शाहिद मीर

ख़ौफ़ से अब यूँ न अपने घर का दरवाज़ा लगा

शाहिद मीर

हर इरादा मुज़्महिल हर फ़ैसला कमज़ोर था

शाहिद मीर

ख़ूँ का सैलाब था जो सर से अभी गुज़रा है

शाहिद माहुली

अजीब लोग

शाहिद माहुली

कश्ती रवाँ-दवाँ थी समुंदर खुला हुआ

शाहिद माहुली

कश्ती रवाँ-दवाँ थी समुंदर खुला हुआ

शाहिद माहुली

हर दर-ओ-दीवार पे लर्ज़ां कोई पैकर लगे

शाहिद माहुली

इक अज़ाब होता है रोज़ जी का खोना भी

शाहिद लतीफ़

जो देखता है मुझे आईने के अंदर से

शाहिद कलीम

अंधेरे घर में चराग़ों से कुछ न काम लिया

शाहिद कलीम

नींद से आँख खुली है अभी देखा क्या है

शाहिद कबीर

सीने हैं चाक और गरेबाँ सिले हुए

शाहिद इश्क़ी

सुना है तेरी ज़माने पे हुक्मरानी है

शाहिद ग़ाज़ी

मेरे दिल में घर भी बनाता रहता है

शाहिद ग़ाज़ी

मुज़्तरिब सा रहता है मुझ से बात करते वक़्त

शाहिद फ़रीद

साज़-ए-दिल साज़-ए-जुनूँ साज़-ए-वफ़ा कुछ भी नहीं

शाहिद भोपाली

जुनून-ए-शौक़ की राहों में जब अपने क़दम निकले

शाहिद भोपाली

यूँ तो इस बज़्म में अपने भी हैं बेगाने भी

शाहिद अख़्तर

अगर ये रौशनी क़ल्ब ओ नज़र से आई है

शाहीन मुफ़्ती

कसीला ज़ाइक़ा

शाहीन ग़ाज़ीपुरी

ये भी शायद तिरा ए'जाज़-ए-नज़र है ऐ दोस्त

शाहीन ग़ाज़ीपुरी

क़ुबूल है ग़म-ए-दुनिया तिरे हवाले से

शाहीन ग़ाज़ीपुरी

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