घर Poetry (page 35)

सफ़र का नश्शा चढ़ा है तो क्यूँ उतर जाए

शहरयार

ये क़ाफ़िले यादों के कहीं खो गए होते

शहरयार

उस को किसी के वास्ते बे-ताब देखते

शहरयार

तिलिस्म ख़त्म चलो आह-ए-बे-असर का हुआ

शहरयार

तेरे वा'दे को कभी झूट नहीं समझूँगा

शहरयार

खुले जो आँख कभी दीदनी ये मंज़र हैं

शहरयार

कारोबार-ए-शौक़ में बस फ़ाएदा इतना हुआ

शहरयार

कब समाँ देखेंगे हम ज़ख़्मों के भर जाने का

शहरयार

जागता हूँ मैं एक अकेला दुनिया सोती है

शहरयार

गुज़रे थे हुसैन इब्न-ए-अली रात इधर से

शहरयार

ख़ला सा कहीं है

शहराम सर्मदी

कार-ए-बेहूदा

शहराम सर्मदी

इस सोच में ही मरहला-ए-शब गुज़र गया

शहराम सर्मदी

हुक्मराँ जब से हुईं बस्ती पे अफ़्वाहें वहाँ

शहराम सर्मदी

ताक़-ए-जाँ में तेरे हिज्र के रोग संभाल दिए

शहनाज़ नूर

कभी जो मारका ख़्वाबों से रत-जगों का हुआ

शहनाज़ नूर

पाप

शहनाज़ नबी

मस्कन

शहनाज़ नबी

मोहब्बत से तिरी यादें जगा कर सो रहा हूँ

शहनवाज़ ज़ैदी

मेज़ पे चेहरा ज़ुल्फ़ें काग़ज़ पर

शहनवाज़ ज़ैदी

मिरे ख़ुदा कोई छाँव कोई ज़मीं कोई घर

शहनवाज़ ज़ैदी

किसी बंजर तख़य्युल पर किसी बे-आब रिश्ते में

शहनवाज़ ज़ैदी

दरीचा आइने पर खुल रहा है

शहनवाज़ ज़ैदी

उसे जब भी देखा बहुत ध्यान से

शाहिदा तबस्सुम

मैं ज़हर रही हर शाम रही

शाहिदा तबस्सुम

है शर्त क़ीमत-ए-हुनर भी अब तो रब्त-ए-ख़ास पर

शाहिदा तबस्सुम

सारे पत्थर और आईने एक से लगते हैं

शाहिदा हसन

सराब-ए-शब भी है ख़्वाब-ए-शिकस्ता-पा भी है

शाहिदा हसन

लम्स आहट के हवाओं के निशाँ कुछ भी नहीं

शाहिदा हसन

कोई तारा न दिखा शाम की वीरानी में

शाहिदा हसन

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