घर Poetry (page 33)

कहीं से चाँद कहीं से क़ुतुब-नुमा निकला

शकील आज़मी

एक सुराख़ सा कश्ती में हुआ चाहता है

शकील आज़मी

अजीब मंज़र है बारिशों का मकान पानी में बह रहा है

शकील आज़मी

प्यार की जोत से घर घर है चराग़ाँ वर्ना

शकेब जलाली

साथी

शकेब जलाली

मौज-ए-ग़म इस लिए शायद नहीं गुज़री सर से

शकेब जलाली

इस ख़ाक-दाँ में अब तक बाक़ी हैं कुछ शरर से

शकेब जलाली

इस बुत-कदे में तू जो हसीं-तर लगा मुझे

शकेब जलाली

आ के पत्थर तो मिरे सहन में दो चार गिरे

शकेब जलाली

साथ ग़ुर्बत में कोई ग़ैर न अपना निकला

शकेब बनारसी

बे-आब-ओ-बे-ग्याह हुआ उस को छोड़ कर

शकेब अयाज़

समझ में आती है बादल की आह-ओ-ज़ारी अब

शाइस्ता यूसुफ़

लिखे हुए अल्फ़ाज़ में तासीर नहीं है

शाइस्ता मुफ़्ती

अजनबी शहर में उल्फ़त की नज़र को तरसे

शाइस्ता मुफ़्ती

तुम आओगे

शाइस्ता हबीब

मौत मेरी सखी

शाइस्ता हबीब

ख़्वाब की बातें

शाइस्ता हबीब

तू ने ग़ारत किया घर बैठे घर इक आलम का

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

रात दिन यार बग़ल में हो तो घर बेहतर है

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

पहन कर जामा बसंती जो वो निकला घर सूँ

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

क्यूँ मोज़ाहिम है मेरे आने से

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

कोई बतलाता नहीं आलम में उस के घर की राह

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

किया था दिन का वादा रात को आया तो क्या शिकवा

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

घर-ब-घर है वो मस्त-ए-इश्वा-ओ-नाज़

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

तू सुब्ह-दम न नहा बे-हिजाब दरिया में

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

तू देख उसे सब जा आँखों के उठा पर्दे

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

था पास अभी किधर गया दिल

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

तरीक़त में अगर ज़ाहिद मुझे गुमराह जाने है

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

शहर में फिरता है वो मय-ख़्वार मस्त

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

क्या हुआ गर शैख़ यारो हाजी-उल-हरमैन है

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

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