घर Poetry (page 31)

दूर फ़ज़ा में एक परिंदा खोया हुआ उड़ानों में

शम्स फ़र्रुख़ाबादी

चाँद तारों ने भी जब रख़्त-ए-सफ़र खोला है

शम्स फ़र्रुख़ाबादी

लोग क्यूँ ढूँड रहे हैं मुझे पत्थर ले कर

शमीम तारिक़

दीवार की सूरत था कभी दर की तरह था

शमीम रविश

आँखों में हिज्र चेहरे पे ग़म की शिकन तो है

शमीम रविश

नया लहजा ग़ज़ल का मिस्रा-ए-सानी में रक्खा है

शमीम क़ासमी

पी कर भी तबीअत में तल्ख़ी है गिरानी है

शमीम करहानी

चमन लहक के रह गया घटा मचल के रह गई

शमीम करहानी

तिरा जल्वा निहायत दिल-नशीं है

शमीम जयपुरी

जब सुब्ह का मंज़र होता है या चाँदनी-रातें होती हैं

शमीम जयपुरी

वो एक शोर सा ज़िंदाँ में रात भर क्या था

शमीम हनफ़ी

तुम्हारे चाक पर ऐ कूज़ा-गर लगता है डर हम को

शमीम हनफ़ी

शाम आई सेहन-ए-जाँ में ख़ौफ़ का बिस्तर लगा

शमीम हनफ़ी

फिर लौट के इस बज़्म में आने के नहीं हैं

शमीम हनफ़ी

लक़ड़हारे तुम्हारे खेल अब अच्छे नहीं लगते

शमीम हनफ़ी

क्यूँ परेशान हुआ जाता है दिल क्या जाने

शमीम हनफ़ी

कई रातों से बस इक शोर सा कुछ सर में रहता है

शमीम हनफ़ी

कभी सहरा में रहते हैं कभी पानी में रहते हैं

शमीम हनफ़ी

एक बेनाम-ओ-निशाँ रूह का पैकर हूँ मैं

शमीम हनफ़ी

आना उसी का बज़्म से जाना उसी का है

शमीम हनफ़ी

हसीन रुत है मगर कौन घर से निकलेगा

शमीम फ़ारूक़ी

अपना साया देख कर मैं बे-तहाशा डर गया

शमीम अनवर

कोई ऐसे वक़्त में हम से बिछड़ा है

शमीम अब्बास

उम्र गुज़र जाती है क़िस्से रह जाते हैं

शमीम अब्बास

शाकी बद-ज़न आज़ुर्दा हैं मुझ से मेरे भाई यार

शमीम अब्बास

शहर में आ ही गए हैं तो गुज़ारा कर लें

शमीम अब्बास

इक्का दुक्का शाज़-ओ-नादिर बाक़ी हैं

शमीम अब्बास

याद-ए-वतन

शाकिर मेरठी

भुगत रहा हूँ ख़ुद अपने किए का ख़म्याज़ा

शाकिर ख़लीक़

उल्फ़त में बिगड़ कर भी इक वज़्अ निकाली है

शाकिर इनायती

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