घर Poetry (page 29)

जफ़ा पे शुक्र का उम्मीद-वार क्यूँ आया

शौक़ क़िदवाई

हुई या मुझ से नफ़रत या कुछ इस में किब्र-ओ-नाज़ आया

शौक़ क़िदवाई

फ़रियाद और तुझ को सितमगर कहे बग़ैर

शौक़ क़िदवाई

भागे अच्छी शक्लों वाले इश्क़ है गोया काम बुरा

शौक़ क़िदवाई

रो रही है जिस तरह ये शम्अ परवाने के बाद

शौक़ देहलवी मक्की

न जब देखी गई मेरी तड़प मेरी परेशानी

शौक़ बहराइची

महव-ए-नग़्मा मिरा क़ातिल जो रहा करता है

शौक़ बहराइची

मह-जबीनों की मोहब्बत का नतीजा न मिला

शौक़ बहराइची

ईमान की लग़्ज़िश का इम्कान अरे तौबा

शौक़ बहराइची

गिन के देता है बला-नोशों को पैमाना अभी

शौक़ बहराइची

फैमली-प्लैनिंग

शौकत थानवी

रात इक नादार का घर जल गया था और बस

शौकत परदेसी

एक आसेब का साया था जो सर से उतरा

शौकत काज़मी

तराना-ए-उर्दू

शातिर हकीमी

ये रात कितनी भयानक है बाम-ओ-दर के लिए

शातिर हकीमी

काट कर जो राह का बूढ़ा शजर ले जाएगा

शर्मा तासीर

शायद उसे ज़रूरत हो अब पर्दे की

शारिक़ कैफ़ी

अजब लहजे में करते थे दर ओ दीवार बातें

शारिक़ कैफ़ी

मोहब्बत की इंतिहा पर

शारिक़ कैफ़ी

कुतिया

शारिक़ कैफ़ी

जनाज़े में तो आओगे न मेरे

शारिक़ कैफ़ी

उदास हैं सब पता नहीं घर में क्या हुआ है

शारिक़ कैफ़ी

तरह तरह से मिरा दिल बढ़ाया जाता है

शारिक़ कैफ़ी

तन से जब तक साँस का रिश्ता रहेगा

शारिक़ कैफ़ी

सियाने थे मगर इतने नहीं हम

शारिक़ कैफ़ी

पहली बार वो ख़त लिक्खा था

शारिक़ कैफ़ी

मुमकिन ही न थी ख़ुद से शनासाई यहाँ तक

शारिक़ कैफ़ी

कोई कुछ भी कहता रहे सब ख़ामोशी से सुन लेता है

शारिक़ कैफ़ी

ख़मोशी बस ख़मोशी थी इजाज़त अब हुई है

शारिक़ कैफ़ी

कभी ख़ुद को छूकर नहीं देखता हूँ

शारिक़ कैफ़ी

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