घर Poetry (page 28)

निकले कभी न घर से मगर इस के बावजूद

शीन काफ़ निज़ाम

गली के मोड़ से घर तक अँधेरा क्यूँ है 'निज़ाम'

शीन काफ़ निज़ाम

एक आसेब है हर इक घर में

शीन काफ़ निज़ाम

धूल उड़ती है धूप बैठी है

शीन काफ़ निज़ाम

दरवाज़ा कोई घर से निकलने के लिए दे

शीन काफ़ निज़ाम

वही न मिलने का ग़म और वही गिला होगा

शीन काफ़ निज़ाम

पाँव में दूर का सफ़र चमके

शीन काफ़ निज़ाम

मौज-ए-हवा तो अब के अजब काम कर गई

शीन काफ़ निज़ाम

मौज-ए-हवा से फूलों के चेहरे उतर गए

शीन काफ़ निज़ाम

इक साएँ साएँ घेरे है गिरते मकान को

शीन काफ़ निज़ाम

दरवाज़ा कोई घर से निकलने के लिए दे

शीन काफ़ निज़ाम

अक्स ने आईने का घर छोड़ा

शीन काफ़ निज़ाम

आँखों में रात ख़्वाब का ख़ंजर उतर गया

शीन काफ़ निज़ाम

बे-नंग-ओ-नाम

शाज़ तमकनत

वो नियाज़-ओ-नाज़ के मरहले निगह-ओ-सुख़न से चले गए

शाज़ तमकनत

सिमट सिमट सी गई थी ज़मीं किधर जाता

शाज़ तमकनत

शिकन शिकन तिरी यादें हैं मेरे बिस्तर की

शाज़ तमकनत

सन कर बयान-ए-दर्द कलेजा दहल न जाए

शाज़ तमकनत

सँभला नहीं दिल तुझ से बिछड़ कर कई दिन तक

शाज़ तमकनत

न महफ़िल ऐसी होती है न ख़ल्वत ऐसी होती है

शाज़ तमकनत

कौन देता रहा सहरा में सदा मेरी तरह

शाज़ तमकनत

हयात रास न आए अजल बहाना करे

शाज़ तमकनत

ज़माना याद रक्खेगा तुम्हें ये काम कर जाना

शायान क़ुरैशी

ज़ख़्म सीने का फिर उभर आया

शायान क़ुरैशी

सफ़र कहने को जारी है मगर अज़्म-ए-सफ़र ग़ाएब

शायान क़ुरैशी

हालात के कोहना दर-ओ-दीवार से निकलें

शायान क़ुरैशी

वो ले के दिल को ये सोची कहीं जिगर भी है

शौक़ क़िदवाई

तेरी सी भी आफ़त कोई ऐ सोज़िश-ए-तब है

शौक़ क़िदवाई

मारे ग़ुस्से के ग़ज़ब की ताब रुख़्सारों में है

शौक़ क़िदवाई

लब चुप हैं तो क्या दिल गिला-पर्दाज़ नहीं है

शौक़ क़िदवाई

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