घर Poetry (page 26)

निकाल ज़ात से बाहर निकाल तन्हाई

शुजा ख़ावर

ख़ुदा को आज़माना चाहिए था

शुजा ख़ावर

हालत उसे दिल की न दिखाई न ज़बाँ की

शुजा ख़ावर

घर में बेचैनी हो तो अगले सफ़र की सोचना

शुजा ख़ावर

गरचे बादल पानी बरसाता हुआ घर घर फिरा

शुजा ख़ावर

दोस्त का घर और दुश्मन का पता मालूम है

शुजा ख़ावर

सहरा में कड़ी धूप का डर होते हुए भी

शोज़ेब काशिर

बहता है कोई ग़म का समुंदर मिरे अंदर

शोज़ेब काशिर

वहशत का कहीं असर नहीं है

शोहरत बुख़ारी

जब मंज़िलों वहम था न शब का

शोहरत बुख़ारी

हम शहर में इक शम्अ की ख़ातिर हुए बर्बाद

शोहरत बुख़ारी

तिरे आँगन में है जो पेड़ फूलों से लदा होगा

शोभा कुक्कल

जो सजता है कलाई पर कोई ज़ेवर हसीनों की

शोभा कुक्कल

बातें करने में तो दुनिया में सभी होश्यार थे

शोभा कुक्कल

मिल गया जब वो नगीं फिर ख़ूबी-ए-तक़दीर से

शोएब निज़ाम

किसी नादीदा शय की चाह में अक्सर बदलते हैं

शोएब निज़ाम

अब्र का टुकड़ा कोई बाला-ए-बाम आता हुआ

शोएब निज़ाम

नाला-ए-दिल की सदा दीवार में है दर में है

शोएब अहमद मेरठी नुद्रत

बेच दी क्यूँ ज़िंदगी दो-चार आने के लिए

शिवकुमार बिलग्रामी

मुझ को कहाँ ये होश तिरी जल्वा-गाह में

शिव दयाल सहाब

वो जो मुझ से ख़फ़ा नहीं होता

शिफ़ा कजगावन्वी

जिन के फ़ुटपाठ पे घर पाँव में छाले होंगे

शिफ़ा कजगावन्वी

अदल-ए-जहाँगीरी

शिबली नोमानी

तीस दिन के लिए तर्क-ए-मय-ओ-साक़ी कर लूँ

शिबली नोमानी

क़ुल्ज़ुम-ए-उल्फ़त में वो तूफ़ान का आलम हुआ

शेर सिंह नाज़ देहलवी

दिल दिया है हम ने भी वो माह-ए-कामिल देख कर

शेर सिंह नाज़ देहलवी

पहुँचा है आज क़ैस का याँ सिलसिला मुझे

शेर मोहम्मद ख़ाँ ईमान

मेहरबाँ पाते नहीं तेरे तईं यक आन हम

शेर मोहम्मद ख़ाँ ईमान

दियत इस क़ातिल-ए-बे-रहम से क्या लीजिएगा

शेर मोहम्मद ख़ाँ ईमान

दिल के आईने में नित जल्वा-कुनाँ रहता है

शेर मोहम्मद ख़ाँ ईमान

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