घर Poetry (page 24)

हर सुब्ह अपने घर में उसी वक़्त जागना

सुहैल अहमद ज़ैदी

तमन्ना दिल में घर करती बहुत है

सुहैल अहमद ज़ैदी

सब तमाशे हो चुके अब घर चलो

सुहैल अहमद ज़ैदी

कुछ दफ़्न है और साँस लिए जाता है

सुहैल अहमद ज़ैदी

कुछ दफ़्न है और साँस लिए जाता है

सुहैल अहमद ज़ैदी

फ़क़ीह-ए-शहर से रिश्ता बनाए रहता हूँ

सुहैल अहमद ज़ैदी

दुनिया के कुछ न कुछ तो तलबगार से रहे

सुहैल अहमद ज़ैदी

दुनिया के कुछ न कुछ तो तलबगार से रहे

सुहैल अहमद ज़ैदी

आँखों को मयस्सर कोई मंज़र ही नहीं था

सुहैल अहमद ज़ैदी

होता है मिरे दिल में हसीनों का गुज़र भी

सुहा मुजद्ददी

उठिए तो कहाँ जाइए जो कुछ है यहीं है

सुहा मुजद्ददी

ऐ हमराज़

सूफ़िया अनजुम ताज

वो एक लड़की जो ख़ंदा-लब थी न जाने क्यूँ चश्म-तर गई वो

सूफ़िया अनजुम ताज

शायद मैं ज़िंदगी की सहर ले के आ गया

सुदर्शन फ़ाकिर

दिल के दीवार-ओ-दर पे क्या देखा

सुदर्शन फ़ाकिर

हम न सही

सुबोध लाल साक़ी

लाख बदला बदल नहीं पाए

सोनरूपा विशाल

तुम ने महसूस कहाँ मेरी ज़रूरत की है

सिया सचदेव

सुलगते दश्त का मंज़र हुई हैं

सिया सचदेव

मैं जिस दिन से अकेली हो गई हूँ

सिया सचदेव

कुछ इस तरह से है मेरे असर में तन्हाई

सिया सचदेव

वही सितारा जो बुझ गया हम-सफ़र था मेरा

सिराज मुनीर

क़फ़स भी बिगड़ी हुई शक्ल है नशेमन की

सिराज लखनवी

ये इंक़लाब भी ऐ दौर-ए-आसमाँ हो जाए

सिराज लखनवी

महरम-ए-दिल हुआ वो सहरा वा

सिराज औरंगाबादी

हमारे पास जानाँ आन पहुँचा

सिराज औरंगाबादी

कोई महबूब सितमगर भी तो हो सकता है

सिरज़ अालम ज़ख़मी

समुंदरों में सराब और ख़ुश्कियों में गिर्दाब देखता है

सिराज अजमली

नाकाम मुज़ाकरात

सिदरा सहर इमरान

सफ़र की धूप ने चेहरा उजाल रक्खा था

सिदरा सहर इमरान

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