घर Poetry (page 23)

दिन के पहले पहर में ही अपना बिस्तर छोड़ कर

स्वप्निल तिवारी

दिन के पहले पहर मैं ही अपना बिस्तर छोड़ कर

स्वप्निल तिवारी

धूप के भीतर छुप कर निकली

स्वप्निल तिवारी

धीरे धीरे ढलते सूरज का सफ़र मेरा भी है

स्वप्निल तिवारी

वापस घर जा ख़त्म हुआ

सालेह नदीम

खिड़की दरवाज़ा खोलो

सालेह नदीम

सुनी है रौशनी के क़त्ल की जब से ख़बर मैं ने

सुरूर अम्बालवी

यूँ तो सब सामान पड़ा है

सुरेन्द्र शजर

हर एक डूबता मंज़र दिखाई देता है

सुनील आफ़ताब

ऐसी ख़ुशबू तू मुझे आज मयस्सर कर दे

सुमन ढींगरा दुग्गल

अपने ही टूटे हुए ख़्वाबों को दिल चुनता भी है

सुल्तान सब्र वानी

मैं अब्र-ओ-बाद से तूफ़ाँ से सब से डरता हूँ

सुलतान रशक

जाने क्यूँ बातों से जलते हैं गिले करते हैं लोग

सुलतान रशक

अजब इंसान हूँ ख़ुश-फ़हमियों के घर में रहता हूँ

सुलतान रशक

रक़्स करता है ब-अंदाज़-ए-जुनूँ दौड़ता है

सुल्तान अख़्तर

मिरी क़दीम रिवायत को आज़माने लगे

सुल्तान अख़्तर

मैं लड़खड़ाया तो मुझ को गले लगाने लगे

सुल्तान अख़्तर

दर-ब-दर की ख़ाक पेशानी पे मल कर आएगा

सुल्तान अख़्तर

अपनी तहज़ीब की दीवार सँभाले हुए हैं

सुल्तान अख़्तर

अब तक लहू का ज़ाइक़ा ख़ंजर पे नक़्श है

सुल्तान अख़्तर

वो सर से पाँव तलक चाहतों में डूबा था

सुलेमान ख़ुमार

न ढलती शाम न ठंडी सहर में रक्खा है

सुलेमान ख़ुमार

मुद्दत हुई राहत भरा मंज़र नहीं उतरा

सुलेमान ख़ुमार

कुछ नहीं है तो ये अंदेशा ये डर कैसा है

सुलेमान ख़ुमार

दश्त में ये जाँ-फ़ज़ाँ मंज़र कहाँ से आ गए

सुलेमान ख़ुमार

दश्त में घास का मंज़र भी मुझे चाहिए है

सुलेमान ख़ुमार

डीप-फ़्रीज़

सुलैमान अरीब

तिरा दिल तो नहीं दिल की लगी हूँ

सुलैमान अरीब

नहीं इस दश्त में कोई ख़िज़र है

सुलैमान अहमद मानी

हँस दिए ज़ख़्म-ए-जिगर जैसे कि गुल-हा-ए-बहार

सुहैल काकोरवी

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