घर Poetry (page 25)

सफ़र के बीच वो बोला कि अपने घर जाऊँ

सिदरा सहर इमरान

ज़बान-ए-ख़ल्क़ को चुप आस्तीं को तर पा कर

सिद्दीक़ मुजीबी

शरीक-ए-ग़म कोई कब मो'तबर निकलता है

सिद्दीक़ मुजीबी

मौज-ए-ख़याल-ए-यार ग़म-ए-आसार आई है

सिद्दीक़ मुजीबी

अजीब धुँद है आँखों को सूझता भी नहीं

सिद्दीक़ मुजीबी

अजब पागल है दिल कार-ए-जहाँ बानी में रहता है

सिद्दीक़ मुजीबी

शहर-ए-एहसास में ज़ख़्मों के ख़रीदार बहुत

सिद्दीक़ अफ़ग़ानी

हर चंद कि प्यारा था मैं सूरज की नज़र का

सिद्दीक़ अफ़ग़ानी

ग़ाज़ा तो तिरा उतर गया था

सिद्दीक़ अफ़ग़ानी

निकल आए जो हम घर से तो सौ रस्ते निकल आए

सिद्दीक़ शाहिद

बजा है ख़्वाब-नवर्दी प ख़्वाब ऐसे हों

सिद्दीक़ शाहिद

शौक़-ए-आवारा यूँही ख़ाक-बसर जाएगा

सिद्दीक़ शाहिद

शहर सहरा है घर बयाबाँ है

सिद्दीक़ शाहिद

निकाल लाया है घर से ख़याल का क्या हो

सिद्दीक़ शाहिद

हूँ किस मक़ाम पे दिल में तिरे ख़बर न लगे

सिद्दीक़ शाहिद

फ़िराक़ ओ वस्ल से हट कर कोई रिश्ता हमारा हो

सिद्दीक़ शाहिद

मुद्दतों में घर हमारे आज यार आ ही गया

बाबू सि द्दीक़ निज़ामी

लहू में डूब के तलवार मेरे घर पहुँची

सिब्त अली सबा

लब-ए-इज़हार पे जब हर्फ़-ए-गवाही आए

सिब्त अली सबा

सोए पानी के तले डूबे हुए पैकर लिखें

सिब्त अहमद

ख़ुदाया हिन्द पर तेरी इनायत हो इनायत हो

श्याम सुंदर लाल बर्क़

अबस है दूरी का उस के शिकवा बग़ल में अपने वो दिल-रुबा है

श्याम सुंदर लाल बर्क़

रुका तो राज़ खुला कब से अपने घर में था

शुजाअत अली राही

तंहाई का इक और मज़ा लूट रहा हूँ

शुजा ख़ावर

इसी पर ख़ुश हैं कि इक दूसरे के साथ रहते हैं

शुजा ख़ावर

घर में बेचैनी हो तो अगले सफ़र की सोचना

शुजा ख़ावर

उस के आने पे भी नहीं आई

शुजा ख़ावर

उधर तो दार पर रक्खा हुआ है

शुजा ख़ावर

तकल्लुफ़ छोड़ कर मेरे बराबर बैठ जाएगा

शुजा ख़ावर

समझते क्या हैं इन दो चार रंगों को उधर वाले

शुजा ख़ावर

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