घर Poetry (page 30)

इंतिहा तक बात ले जाता हूँ मैं

शारिक़ कैफ़ी

होने से मिरे फ़र्क़ ही पड़ता था भला क्या

शारिक़ कैफ़ी

एक मुद्दत हुई घर से निकले हुए

शारिक़ कैफ़ी

इक दिन ख़ुद को अपने पास बिठाया हम ने

शारिक़ कैफ़ी

बे-तकल्लुफ़ मिरा हैजान बनाता है मुझे

शारिक़ कैफ़ी

आइने का साथ प्यारा था कभी

शारिक़ कैफ़ी

ख़्वाब ऐसा भी नज़र आया है अक्सर मुझ को

शारिक़ जमाल

क़ुदरत है तुर्फ़ा-कार तुझे कुछ ख़बर भी है

शारिक़ ईरायानी

मेज़ों पे सजा के अयाग़ धरो

शरीक़ अदील

पस्पाई

शरीफ़ कुंजाही

कितने नाज़ुक कितने ख़ुश-गुल फूलों से ख़ुश-रंग प्याले

शरीफ़ कुंजाही

सुकून-ए-क़ल्ब मयस्सर किसे जहान में है

शारिब मौरान्वी

नग़्मगी से सुकूत बेहतर था

शरीफ़ मुनव्वर

शहर में कैसा ख़तर लगता है

शरीफ़ अहमद शरीफ़

कुछ भी हो उस से जुदाई का सबब घर जाओ

शरीफ़ अहमद शरीफ़

एक शय थी कि जो पैकर में नहीं है अपने

शरीफ़ अहमद शरीफ़

अपने पस-मंज़र में मंज़र बोलते

शरर फ़तेह पुरी

तसव्वुर ने तिरे आबाद जब से घर किया मेरा

शरफ़ मुजद्दिदी

अपनी हस्ती को अंधे कुएँ में गिराना नहीं चाहता

शनावर इस्हाक़

बयान सफ़ाई

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

मसल कर फेंक दूँ आँखें तो कुछ तनवीर हो पैदा

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

महफ़िल का नूर मरजा-ए-अग़्यार कौन है

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

दिन-भर की दौड़ रात के औहाम वसवसे

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

सजे हुए बाम-ओ-दर से आगे की सोचता हूँ

शमशीर हैदर

ख़ुश-कुन ख़बर के धोके में रक्खा गया मुझे

शमशीर हैदर

यूँ ब-ज़ाहिर देखे तो यार सब

शम्स तबरेज़ी

अपना घर भी कोई आसेब का घर लगता है

शम्स तबरेज़ी

ग़म दिए हैं तो मसर्रत के गुहर भी देना

शम्स रम्ज़ी

ये घर जो हमारे लिए अब दश्त-ए-जुनूँ है

शम्स फ़र्रुख़ाबादी

मंज़िल-ए-इश्क़ के राहबर खो गए

शम्स फ़र्रुख़ाबादी

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