घर Poetry (page 32)

जाते कहाँ जुनून के तूफ़ाँ में आ गए

शाकिर इनायती

पलकों पे लरज़ते रहे आँसू की तरह हम

शकील शम्सी

इस घर में मिरे साथ बसर कर के तो देखो

शकील शम्सी

दिल की कहानियों को नया मोड़ क्यूँ दिया

शकील शम्सी

ज़िंदगी और मौत का यूँ राब्ता रह जाएगा

शकील सरोश

लोग कहते हैं कि इस खेल में सर जाते हैं

शकील जमाली

ग़म के पीछे मारे मारे फिरना क्या

शकील जमाली

तुम शुजाअ'त के कहाँ क़िस्से सुनाने लग गए

शकील जमाली

थोड़ा सा माहौल बनाना होता है

शकील जमाली

सारे भूले बिसरों की याद आती है

शकील जमाली

लोग कहते हैं कि इस खेल में सर जाते हैं

शकील जमाली

ग़म का सूरज कभी ढलता ही नहीं

शकील ग्वालिआरी

पी शौक़ से वाइज़ अरे क्या बात है डर की

शकील बदायुनी

दिल की तरफ़ 'शकील' तवज्जोह ज़रूर हो

शकील बदायुनी

ज़लज़ला

शकील बदायुनी

नुमाइश-ए-अलीगढ़

शकील बदायुनी

तस्वीर बनाता हूँ तिरी ख़ून-ए-जिगर से

शकील बदायुनी

न सोचा था ये दिल लगाने से पहले

शकील बदायुनी

हुई हम से ये नादानी तिरी महफ़िल में आ बैठे

शकील बदायुनी

ग़म-ए-जहाँ के फ़साने तलाश करते हैं

शकील बदायुनी

ग़म-ए-आशिक़ी से कह दो रह-ए-आम तक न पहुँचे

शकील बदायुनी

दिल वही दिल जिसे नाशाद किए जाता हूँ

शकील बदायुनी

दिल मरकज़-ए-हिजाब बनाया न जाएगा

शकील बदायुनी

बेकार गई आड़ तिरे पर्दा-ए-दर की

शकील बदायुनी

आँख उन को देखती है नज़ारा किए बग़ैर

शकील बदायुनी

ज़मीन ले के वो आए तो घर बनाया जाए

शकील आज़मी

दूसरे दर्जे की पिछली क़तार का आदमी

शकील आज़मी

ज़रा से ग़म के लिए जान से गुज़र जाना

शकील आज़मी

राह में घर के इशारे भी नहीं निकलेंगे

शकील आज़मी

राज़ में रख तिरी रुस्वाई का क़िस्सा मैं हूँ

शकील आज़मी

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