हाल Poetry (page 14)

ये भी सच है कि नहीं है कोई रिश्ता तुझ से

शहज़ाद अहमद

सुकून कुछ तो मिला दिल का माजरा लिख कर

शहज़ाद अहमद

न बस्तियों को अज़ीज़ रक्खें न हम बयाबाँ से लौ लगाएँ

शहज़ाद अहमद

ख़िज़ाँ जब आए तो आँखों में ख़ाक डालता हूँ

शहज़ाद अहमद

खिले जो फूल तो मुँह छुप गया सितारों का

शहज़ाद अहमद

जो दिल में खटकती है कभी कह भी सकोगे

शहज़ाद अहमद

हम लोगों को अपने दिल के राज़ बताते रहते हैं

शहज़ाद अहमद

हिज्र की रात मिरी जाँ पे बनी हो जैसे

शहज़ाद अहमद

दिल-ए-फ़सुर्दा उसे क्यूँ गले लगा न लिया

शहज़ाद अहमद

देखने उस को कोई मेरे सिवा क्यूँ आए

शहज़ाद अहमद

दरिया कभी इक हाल में बहता न रहेगा

शहज़ाद अहमद

अक़्ल हर बात पे हैराँ है इसे क्या कहिए

शहज़ाद अहमद

तिलिस्म ख़त्म चलो आह-ए-बे-असर का हुआ

शहरयार

शदीद प्यास थी फिर भी छुआ न पानी को

शहरयार

हज़ार बार मिटी और पाएमाल हुई है

शहरयार

नदी थी कश्तियाँ थीं चाँदनी थी झरना था

शहराम सर्मदी

हम अपने इश्क़ की बाबत कुछ एहतिमाल में हैं

शहराम सर्मदी

ताक़-ए-जाँ में तेरे हिज्र के रोग संभाल दिए

शहनाज़ नूर

कभी जो मारका ख़्वाबों से रत-जगों का हुआ

शहनाज़ नूर

पहले जैसा नहीं रहा हूँ

शहनवाज़ ज़ैदी

वहशतों को भी अब कमाल कहाँ

शाहिदा हसन

सलीक़ा इश्क़ में मेरा बड़े कमाल का था

शाहिदा हसन

हर इरादा मुज़्महिल हर फ़ैसला कमज़ोर था

शाहिद मीर

ये जो रब्त रू-ब-ज़वाल है ये सवाल है

शाहिद लतीफ़

हर्फ़-ए-कुन शह-ए-रग-ए-हू में गुम है

शाहिद कमाल

ऐ ज़ौक़ अर्ज़-ए-हुनर हर्फ़-ए-ए'तिदाल में रख

शाहिद कमाल

जो तुम से मिला होगा जो तुम ने दिया होगा

शाहिद ग़ाज़ी

कोई बच नहीं पाता ऐसा जाल बुनते हैं

शाहिद फ़रीद

रंग-ए-नज़र से हुस्न-ए-तमन्ना निखार के

शाहीन सिद्दीक़ी

शहर से बाहर निकलते रास्ते

शाहीन ग़ाज़ीपुरी

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