हुआ Poetry (page 67)

एक लम्हा

शाहिद माहुली

रात ऐसी कि कभी जिस का सवेरा न हुआ

शाहिद माहुली

कुछ दर्द बढ़ा है तो मुदावा भी हुआ है

शाहिद माहुली

कश्ती रवाँ-दवाँ थी समुंदर खुला हुआ

शाहिद माहुली

कश्ती रवाँ-दवाँ थी समुंदर खुला हुआ

शाहिद माहुली

हर दर-ओ-दीवार पे लर्ज़ां कोई पैकर लगे

शाहिद माहुली

बू-ए-पैराहन-ए-सदा आए

शाहिद माहुली

रोज़ खुलने की अदा भी तो नहीं आती है

शाहिद लतीफ़

एक इक मौज को सोने की क़बा देती है

शाहिद लतीफ़

आज भी जिस की है उम्मीद वो कल आए हुए

शाहिद लतीफ़

ज़ख़्म-ए-जिगर को दस्त-ए-जराहत से पूछिए

शाहिद कमाल

ये ज़रूरत है तो फिर इस को ज़रूरत से न देख

शाहिद कमाल

फिर आज दर्द से रौशन हुआ है सीना-ए-ख़्वाब

शाहिद कमाल

नन्हा सा दिया है कि तह-ए-आब है रौशन

शाहिद कमाल

कूज़ा-ए-दर्द में ख़ुशियों के समुंदर रख दे

शाहिद कमाल

कुछ यक़ीं सा गुमान सा कुछ है

शाहिद कमाल

जो मिरी पुश्त में पैवस्त है उस तीर को देख

शाहिद कमाल

जो इस ज़मीन पे रहते थे आसमान से लोग

शाहिद कमाल

इब्तिदा से मैं इंतिहा का हूँ

शाहिद कमाल

ग़मों की रात है और इतनी मुख़्तसर भी नहीं

शाहिद कमाल

फ़िक्र-ए-ईजाद में हूँ खोल नया दर कोई

शाहिद कमाल

धूप के ज़र्द जज़ीरों में नुमू ज़िंदा है

शाहिद कमाल

चश्म-ए-ख़ुश-आब की तमसील में रहने वाले

शाहिद कमाल

भर गए ज़ख़्म तो क्या दर्द तो अब भी कोई है

शाहिद कमाल

अपनी तन्हाई का सामान उठा लाए हैं

शाहिद कमाल

अब्र लिखती है कहीं और घटा लिखती है

शाहिद कमाल

मैं इंतिहा-ए-यास में तन्हा खड़ा रहा

शाहिद कलीम

अंधेरे घर में चराग़ों से कुछ न काम लिया

शाहिद कलीम

वो भी धरती पे उतारी हुई मख़्लूक़ ही है

शाहिद कबीर

इस सोच में ज़िंदगी बिता दी

शाहिद कबीर

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