हुआ Poetry (page 68)

ज़मीं पे चल न सका आसमान से भी गया

शाहिद कबीर

रेत की लहरों से दरिया की रवानी माँगे

शाहिद कबीर

पुकारती है जो तुझ को तिरी सदा ही न हो

शाहिद कबीर

पाया नहीं वो जो खो रहा हूँ

शाहिद कबीर

क्या फ़र्ज़ है ये जिस्म के ज़िंदाँ में सज़ा दे

शाहिद कबीर

हर आइने में बदन अपना बे-लिबास हुआ

शाहिद कबीर

वो हर्फ़-ए-शौक़ हूँ जिस का कोई सियाक़ न हो

शाहिद इश्क़ी

शहर-ए-निगाराँ में फिरते हैं हम आवारा रात ढले

शाहिद इश्क़ी

न ख़ुदा है न नाख़ुदा है कोई

शाहिद इश्क़ी

किस किस के आँसू पूछोगे और किस किस को बहलाओगे

शाहिद इश्क़ी

जिस को चाहा था न पाया जो न चाहा था मिला

शाहिद इश्क़ी

जिस को चाहा था न पाया जो न चाहा था मिला

शाहिद इश्क़ी

एक तुम्हारे प्यार की ख़ातिर जग के दुख अपनाए थे

शाहिद इश्क़ी

जो तुम से मिला होगा जो तुम ने दिया होगा

शाहिद ग़ाज़ी

बेताबियों को मेरी बढ़ाने लगी हवा

शाहिद ग़ाज़ी

उड़ता हुआ इक बादल था

शाहिद अज़ीज़

बाज़ार

शाहिद अख़्तर

ज़ोर उस पर है न हालात पे क़ाबू यारो

शाहिद अख़्तर

ज़रूरत क्या है

शाहीन मुफ़्ती

शहर से बाहर निकलते रास्ते

शाहीन ग़ाज़ीपुरी

नक़दी कहाँ से आएगी

शाहीन ग़ाज़ीपुरी

हैरानी का बोझ

शाहीन ग़ाज़ीपुरी

ज़िंदगी है मुख़्तसर आहिस्ता चल

शाहीन ग़ाज़ीपुरी

सच का लम्हा जब भी नाज़िल होता है

शाहीन ग़ाज़ीपुरी

हमारे हाल-ए-ज़बूँ पर मलाल है कितना

शाहीन ग़ाज़ीपुरी

ज़माना मेरी तबाही पे जो उदास हुआ

शाहीन बद्र

ग़ुंचा ग़ुंचा मौसम-ए-रंग-ए-अदा में क़ैद था

शाहीन बद्र

अहल-ए-दुनिया के लिए ये माजरा है मुख़्तलिफ़

शाहीन बद्र

ज़मीं का आख़िरी मंज़र दिखाई देने लगा

शाहीन अब्बास

सियाही गिरती रहे और दिया ख़राब न हो

शाहीन अब्बास

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